भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 85
ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ७९
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
शब्दः । स प्रजापतिः जन्मान्तरेऽश्वमेधेनायजत । स तद्भावभावित एव कल्पादौ व्यावर्तत । सोऽश्वमेधक्रियाकारकफलात्मत्वेन निर्वृत्तः सन्नकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति । एवं महत्कार्यं कामयित्वा लोकवदश्राम्यत् ।दिया है। उस प्रजापतिने जन्मान्तरमें अश्वमेध यज्ञद्वारा यजन किया था। इसलिये उसकी भावनासे युक्त हुआ ही वह कल्पके आरम्भमें प्रजापति हुआ। अश्वमेधके क्रिया, कारक और फलरूपसे सम्पन्न होकर उसने कामना की कि मैं पुनः महान् यज्ञद्वारा यजन करूँ। इस प्रकार महान् कार्यके लिये कामना करके वह अन्य लोगोंके समान श्रमित हो गया।
स तपोऽतप्यत । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्येति पूर्ववत्, यशो वीर्यमुदक्रामदिति । स्वयमेव पदार्थमाह—प्राणाश्चक्षुरादयो वै यशो यशोहेतुत्वात् तेषु हि सत्सु ख्यातिर्भवति, तथा वीर्यं बलमस्मिञ्शरीरे । न ह्युत्क्रान्तप्राणो यशस्वी बलवान्वा भवति । तस्मात्प्राणा एव यशो वीर्यं चास्मिञ्शरीरे । तदेवं प्राणलक्षणं यशो वीर्यमुदक्रामदुत्क्रान्तवत् ।उसने तप किया। उस श्रान्त और तपे हुएका—ऐसा पूर्ववत् समझना चाहिये-यश और वीर्य निकल गया। अब श्रुति स्वयं ही [यश और वीर्य] पदोंका अर्थ बतलाती है। चक्षु आदि जो प्राण हैं वे ही यशके हेतु होनेके कारण यश हैं क्योंकि उनके रहनेपर ही ख्याति होती है। तथा वे ही इस शरीरमें वीर्य यानी बल हैं। जिसके प्राण निकल गये हैं वह पुरुष यशस्वी या बलवान् नहीं होता। अतः इस शरीरमें प्राण ही यश और वीर्य हैं। वे इस प्रकारके प्राणरूप यश और वीर्य निकल गये।
तदेवं यशोवीर्यभूतेषु प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरान्निष्क्रान्तेषु त-तब इस प्रकार यश और वीर्यभूत प्राणोंके उत्क्रमण करनेपर अर्थात् शरीरसे निकल जानेपर