बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 860, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 860
| ८४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| स्वयमेव प्रज्ञा, उत प्रज्ञानिमित्ता—यथा आयतनप्रतिष्ठे ब्रह्मणो व्यतिरिक्ते, तद्वत् किम् ? <br><br> न; कथं तर्हि ? <br><br> वागेव सम्राडिति होवाच; वागेव प्रज्ञेति होवाचोक्तवान्, न व्यतिरिक्ता प्रज्ञेति । कथं पुनर्वागेव प्रज्ञा ? इत्युच्यते— <br><br> वाचा वै सम्राड् बन्धुः प्रज्ञायते—अस्माकं बन्धुरित्युक्ते प्रज्ञायते बन्धुः; तथर्गादि, इष्टं यागनिमित्तं धर्मजातम्, हुतं-होमनिमित्तं च, आशितमन्नदाननिमित्तम्, पायितं पानदाननिमित्तम्, अयं च लोकः, इदं च जन्म, परश्च लोकः, प्रतिपत्तव्यं च जन्म, सर्वाणि च भूतानि—वाचैव सम्राट् प्रज्ञायन्ते । अतो वाग् वै सम्राट् परमं ब्रह्म । नैनं यथोक्तब्रह्मविदं वाग् जहाति; सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति बलिदानादिभिः; इह देवो | क्या है ? क्या स्वयं प्रज्ञा ही प्रज्ञता है अथवा जिसका प्रज्ञा निमित्त है, [ वह वाक् ] प्रज्ञता है ? जिस प्रकार आयतन और प्रतिष्ठा [ वाक्रूप ] ब्रह्मसे भिन्न हैं, उसी प्रकार प्रज्ञता भी है क्या ? नहीं, तो फिर किस प्रकार है ? <br><br> 'हे सम्राट् ! वह वाक् ही है' ऐसा [ याज्ञवल्क्यने ] उत्तर दिया, 'वाक् ही प्रज्ञा है, प्रज्ञा उससे भिन्न नहीं है—इस प्रकार याज्ञवल्क्यने कहा ।' किंतु वाक् ही प्रज्ञा किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है, <br><br> 'हे सम्राट् ! वाक्से ही बन्धुका ज्ञान होता है । 'यह हमारा बन्धु है' ऐसा कहनेपर ही बन्धुका ज्ञान होता है । इसी प्रकार ऋग्वेदादि, इष्ट—यागसे होनेवाले धर्म, हुत—होमसे होनेवाले धर्म, आशित—अन्नदानजनित धर्म, पायित—जलदानजनित धर्म, यह लोक, यह जन्म, परलोक, आगे प्राप्त होनेवाला जन्म और सम्पूर्ण भूत—हे सम्राट् ! इन सबका वाक्से ही ज्ञान होता है, अतः हे सम्राट् ! वाक् ही परम ब्रह्म है । इस उपर्युक्त ब्रह्मको जाननेवालेका वाक् त्याग नहीं करती । समस्त भूत उपहारादिके द्वारा इसका उपकार करते हैं । |