बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 859, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 859
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८४५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| नाम शरीरम्; प्रतिष्ठा त्रिष्वपि कालेषु य आश्रयः।<br>आहेतरः—न मेऽब्रवीदिति। | थे ? आयतन शरीरको कहते हैं और जो तीनों कालोंमें आश्रय हो वह प्रतिष्ठा कहलाता है।<br>दूसरे (जनक) ने कहा, 'मुझे नहीं बतलाये।' |
| इतर आह—यद्येवमेकपाद् वै एतत्; एकः पादो यस्य ब्रह्मणस्तदिदं एकपाद् ब्रह्म त्रिभिः पादैः शून्यमुपास्यमानमपि न फलाय भवतीत्यर्थः।<br>यद्येवम्, स त्वं विद्वान् सन्बोऽस्मभ्यं ब्रूहि हे याज्ञवल्क्येति। | अन्य (याज्ञवल्क्य) बोला, 'यदि ऐसी बात है तो वह एकपाद ब्रह्म है, जिस ब्रह्मका एक पाद हो वह एकपाद ब्रह्म है, तात्पर्य यह है कि वह तीन पादोंसे शून्य ब्रह्म उपासना किये जानेपर भी फलप्रद नहीं होता।'<br>(जनक-) 'यदि ऐसी बात है तो हे याज्ञवल्क्यजी ! आप उसके ज्ञाता हैं, इसलिये हमारे प्रति उसका वर्णन कीजिये।' |
| स चाह—वागेवायतनम्, वाग्देवस्य ब्रह्मणो वागेव करणमायतनं शरीरम्, आकाशोऽव्याकृताख्यः प्रतिष्ठोत्पत्तिस्थितिलयकालेषु। प्रज्ञेत्येनदुपासीत—प्रज्ञेतीयमुपनिषद् ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः—प्रज्ञेति कृत्वैनद् ब्रह्मोपासीत। | याज्ञवल्क्यने कहा—'वाक् ही आयतन है—उस वाग्देवरूप ब्रह्मका वाक् ही करण—आयतन अर्थात् शरीर है तथा उसकी उत्पत्ति, स्थिति और लयके समय अव्याकृतसंज्ञक आकाश उसकी प्रतिष्ठा है। उसकी 'प्रज्ञा' इस रूपसे उपासना करे। 'प्रज्ञा' यह उपनिषद् उस ब्रह्मका चतुर्थ पाद है। 'प्रज्ञा' ऐसा मानकर उस ब्रह्मकी उपासना करे।' |
| का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य ? किं | [जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! प्रज्ञता |