बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 858, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भवान्; तच्छृणवामेति । इतर आह—अब्रवीदुक्तवान् मे ममाचार्यः, जित्वा नामतः, शिलिनस्यापत्यं शैलिनिः—वाग् वै ब्रह्मेति वाग्देवता ब्रह्मेति ।<br><br>आहेतरः—यथा मातृमान् माता यस्य विद्यते पुत्रस्य सम्यगनुशास्त्री अनुशासनकर्त्री स मातृमान्; अत ऊर्ध्वं पिता यस्यानुशास्ता स पितृमान्; उपनयनादूर्ध्वमा समावर्तनादाचार्यो यस्यानुशास्ता स आचार्यवान्; एवं शुद्धित्रयहेतुसंयुक्तः स साक्षादाचार्यः स्वयं न कदाचिदपि प्रमाण्याद् व्यभिचरति; स यथा ब्रूयाच्छिष्याय तथासौ जित्वा शैलिनिरुक्तवान् वाग् वै ब्रह्मेति; अवदतो हि किं स्यादिति—न हि मूकस्येहार्थममुत्रार्थं वा किञ्चन स्यात् । किंतु, अब्रवीदुक्तवांस्ते तुभ्यं तस्य ब्रह्मण आयतनं प्रतिष्ठां च—आयतनं | करनेवाले हो; इतर ( जनक ) ने कहा, मुझसे जित्वा नामवाले शिलिनके पुत्र शैलिनिने कहा था कि 'वाक् ही ब्रह्म है' अर्थात् 'वाग्देवता ब्रह्म है।'<br><br>इतर ( याज्ञवल्क्यजी ) बोले, 'जिस प्रकार मातृमान्-जिस पुत्रका सम्यक् प्रकारसे अनुशासन करनेवाली माता विद्यमान है, वह मातृमान्, इसके पश्चात् जिसका अनुशासन करनेवाला पिता है, वह पितृमान् तथा उपनयनके पश्चात् समावर्तन संस्कारतक आचार्य जिसका अनुशासन करनेवाला है, वह आचार्यवान् है; इस प्रकार जो तीन प्रकारकी शुद्धिके हेतुओंसे संयुक्त है, वह साक्षात् आचार्य कभी भी प्रमाणसे व्यभिचरित नहीं हो सकता, वह जिस प्रकार अपने शिष्यको उपदेश करे, उसी प्रकार इस शिलिनके पुत्र जित्वाने तुम्हें यह उपदेश किया है कि वाक् ही ब्रह्म है; क्योंकि न बोलनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? मूकको तो लौकिक या पारलौकिक कोई भी लाभ नहीं हो सकता; किंतु क्या उसने तुम्हें उस ब्रह्मके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये |