भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 857, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 857
ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थे८४३

विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः । स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ २ ॥

[ याज्ञवल्क्य- ] 'तुझसे किसी आचार्यने जो कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक- ] 'मुझसे शिलिनके पुत्र जित्वाने कहा हे कि वाक् ही ब्रह्म है।' [याज्ञवल्क्य-] 'जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस शिलिनके पुत्रने 'वाक् ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि न बोलनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?' [ जनक- ] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'राजन् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक- ] 'याज्ञवल्क्य ! वह हमें आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य- ] 'वाक् ही उसका आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है; उसकी 'प्रज्ञा' इस प्रकार उपासना करे।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! प्रज्ञता क्या है ?' राजन् ! वाक् ही प्रज्ञता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे सम्राट् ! वाक्‌से ही बन्धुका ज्ञान होता है और राजन् ! ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्वाङ्गिरसवेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, इष्ट, हुत, आशित (भूखेको अन्न खिलानेसे होनेवाले धर्म), पायित (प्यासेको पानी पिलानेसे होनेवाले धर्म), यह लोक, परलोक और समस्त भूत वाक्‌से ही जाने जाते हैं। हे सम्राट् ! वाक् ही परब्रह्म है। इस प्रकार उपासना करनेवालेको वाक् नहीं त्यागता, सम्पूर्ण भूत उसको उपहार देते हैं। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' विदेहराज जनकने कहा, 'मैं आपको-जिनसे हाथीके समान बैल उत्पन्न हों ऐसी-सहस्र गौएँ देता हूँ।' उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ २ ॥

किंतु यत्ते तुभ्यं कश्चिदब्रवी-किंतु तुमसे जो कुछ किसी आचार्यने कहा है, वह हम सुनें,
दाचार्यः, अनेकाचार्यसेवी हिक्योंकि तुम बहुत-से आचार्योंकी सेवा