बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 884, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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जनकके पास याज्ञवल्क्यका आना और राजाका पहले प्राप्त किये हुए इच्छानुसार प्रश्नरूप वरके कारण उनसे प्रश्न करना
जनकँ ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो याज्ञवल्क्यश्चाग्निहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ स ह कामप्रश्नमेव वव्रे तँ हास्मै ददौ तँ ह सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥ १ ॥
विदेहराज जनकके पास याज्ञवल्क्य गये। उनका विचार था मैं कुछ उपदेश नहीं करूँगा। किंतु, पहले कभी विदेहराज जनक और याज्ञवल्क्यने अग्निहोत्रके विषयमें परस्पर संवाद किया था, उस समय याज्ञवल्क्यने उसे वर दिया था और उसने इच्छानुसार प्रश्न करना ही माँगा था। यह वर याज्ञवल्क्यने उसे दे दिया था; अतः उनसे पहले राजाने ही प्रश्न किया ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम। स च गच्छन्नेवं मेने चिन्तितवान्—न वदिष्ये किञ्चिदपि राज्ञे; गमनप्रयोजनं तु योगक्षेमार्थम्। न वदिष्य इत्येवंसंकल्पोऽपि याज्ञवल्क्यो यद् यज्जनकः पृष्टवांस्तत्तत् प्रतिपेदे; तत्र को हेतुः संकल्पितस्यान्यथाकरणे—इत्यत्राख्यायिकामाचष्टे। | विदेहराज जनकके पास याज्ञवल्क्य गये। उन्होंने जाते हुए ऐसा विचार किया—यह सोचा कि मैं राजाके प्रति कुछ उपदेश नहीं करूँगा; जानेका प्रयोजन तो योगक्षेमके लिये था। 'कुछ उपदेश नहीं करूँगा' इस प्रकार संकल्पवाले होनेपर भी याज्ञवल्क्यने जो-जो भी जनकने पूछा वह सभी बतलाया; इस प्रकार संकल्पित विचारके विरुद्ध करनेमें क्या हेतु था, इस विषयमें श्रुति आख्यायिका बतलाती है। |
| पूर्वत्र किल जनकयाज्ञवल्क्ययोः संवाद आसीदग्निहोत्रे निमित्ते। तत्र जनकस्याग्निहोत्रविषयं विज्ञा- | इससे पहले याज्ञवल्क्य और जनकका अग्निहोत्रके निमित्तसे संवाद हुआ था। उसमें जनकके अग्निहोत्र- |