भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 890, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 890
८७६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

भवतीत्यग्निनेवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥

'हे याज्ञवल्क्य ! आदित्यके अस्त हो जानेपर तथा चन्द्रमाके अस्त हो जानेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है?' 'अग्नि ही इसकी ज्योति होता है। यह अग्निरूप ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है।' 'हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥४॥

अस्तमिते आदित्ये चन्द्रमस्य-<br><br>स्तमितेऽग्निर्ज्योतिः ॥ ४ ॥आदित्यके अस्त होनेपर और चन्द्रमाके अस्त होनेपर अग्नि ज्योति होता है ॥ ४ ॥

४-वाग्ज्योति

अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किं ज्योतिरेवायं पुरुष इतिवागे वास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति तस्माद् वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतेऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र न्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥

'हे याज्ञवल्क्य ! आदित्यके अस्त होनेपर, चन्द्रमाके अस्त होनेपर और अग्निके शान्त होनेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' 'वाक् ही इसकी ज्योति होती है। यह वाक्रूप ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है। इसीसे हे सम्राट् ! जहाँ अपना हाथ भी नहीं जाना जाता, वहाँ ज्यों ही वाणीका उच्चारण किया जाता है कि पास चला जाता है।' 'हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ ५ ॥

शान्तेऽग्नौ वाग्ज्योतिः; वागिति<br><br>शब्दः परिगृह्यते; शब्देन विष-अग्निके शान्त होनेपर वाक् ज्योति है। 'वाक्' इस शब्दसे शब्द ग्रहण किया जाता है; शब्द-