बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 905, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९१
| दस्ति व्यतिरिक्तं चान्तःस्थं ज्योतिरात्मेति ॥ ६ ॥ | संघातसे पृथक् और अपने भीतर ही स्थित आत्मज्योति है—यह सिद्ध हुआ ॥ ६ ॥ |
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आत्माका स्वरूप
</div>| यद्यपि व्यतिरिक्तत्वादि सिद्धम् तथापि समानजातीयानुग्राहकत्वदर्शननिमित्तभ्रान्त्या करणानामेवान्यतमो व्यतिरिक्तो वा इत्यविवेकतः पृच्छति— | यद्यपि आत्माका देहादिसे भिन्न होना इत्यादि बातें सिद्ध हो गयीं तो भी आदित्यादि समानजातीय पदार्थोंका ही अनुग्राहकत्व देखनेके कारण उत्पन्न हुई भ्रान्तिसे 'आत्मा इन्द्रियोंमेंसे ही कोई एक है अथवा उनसे भिन्न है' इसका विवेक न होनेसे जनक पूछता है— |
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कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स समानः सन्नुभौ लोकावनुसञ्चरति ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ॥ ७ ॥
'आत्मा कौन है ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'यह जो प्राणोंमें बुद्धिवृत्तियोंके भीतर रहनेवाला विज्ञानमय ज्योतिःस्वरूप पुरुष है, वह समान (बुद्धिवृत्तियोंके सदृश) हुआ इस लोक और परलोक दोनोंमें संचार करता है। वह [ बुद्धिवृत्तिके अनुसार ] मानो चिन्तन करता है और [ प्राणवृत्तिके अनुरूप होकर ] मानो चेष्टा करता है। वही स्वप्न होकर इस लोक (देहेन्द्रियसंघात) का अतिक्रमण करता है और [ शरीर तथा इन्द्रियरूप ] मृत्युके रूपोंका भी अतिक्रमण करता है ॥ ७ ॥
| कतम इति; न्यायसूक्ष्मताया दुर्विज्ञेयत्वादुपपद्यते भ्रान्तिः । अथवा <br>(पार्श्वनोट: प्रश्नस्यौचित्यं बीजं च) | 'कतम इति'—सूक्ष्म युक्तियां कठिनतासे समझमें आती हैं; इसलिये भ्रान्ति होनी सम्भव ही है। |
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