भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 915, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 915

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०१


संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी (भाष्यार्थ)
धीसादृश्यमेवोभयलोकसञ्चरणहेतुर्न स्वत इति ।दोनों लोकोंमें सञ्चारका कारण बुद्धिकी सदृशता ही है, वह स्वयं सञ्चार नहीं करता ।
तत्र नामरूपोपाधिसादृश्यं भ्रान्तिरेवात्मनः भ्रान्तिनिमित्तं यत्संसरणहेतुः तदेव हेतुर्न स्वतः, इत्येतदुच्यते—यस्मात् स समानः सन्नुभौ लोकावनुक्रमेण सञ्चरति—तदेतत् प्रत्यक्षमित्येतद्दर्शयति—यतो ध्यायतीव ध्यानव्यापारं करोतीव, चिन्तयतीव, ध्यानव्यापारवतीं बुद्धिं स तटस्थेन चित्स्वभावज्योतिरूपेणावभासयन् तत्सदृशस्तत्समानः सन् ध्यायतीव, आलोकवदेव—अतो भवति चिन्तयतीति भ्रान्तिर्लोकस्य; न तु परमार्थतो ध्यायति ।इस सञ्चारमें जो भ्रान्तिजनित नामरूपोपाधिकी सदृशता है, वही हेतु है, वह स्वतः सञ्चार नहीं करता—यही बात अब बतलायी जाती है; क्योंकि वह समान रहकर क्रमशः दोनों लोकोंमें सञ्चार करता है—यह बात प्रत्यक्ष ही है, सो श्रुति दिखलाती है—क्योंकि वह मानो ध्यान करता है—ध्यानव्यापार-सा करता है, चिन्तन-सा करता है । तात्पर्य यह है कि वह प्रकाशके समान ही अपने चित्स्वभाव ज्योतिःस्वरूपसे ध्यानव्यापारवती बुद्धिको तटस्थरूपसे प्रकाशित करता हुआ उसीके समान होकर मानो ध्यान करता है । इसीसे लोकको ऐसी भ्रान्ति होती है कि वह चिन्तन करता है; किंतु वह वस्तुतः ध्यान नहीं करता ।
तथा लेलायतीव अत्यर्थं चलतीव, तेष्वेव करणेषु बुद्ध्यादिषु वायुषु च चलत्सु तदवभासकत्वात् तत्सदृशं तदिति—लेलायतीव, न तु परमार्थतश्चलनधर्मकं तदात्मज्योतिः ।इसी प्रकार 'लेलायतीव'—मानो अधिक चलता है । उन इन्द्रियोंके अर्थात् बुद्धि आदि वायुओंके चलनेपर उनका अवभासक होनेके कारण वह उनके समान जान पड़ता है; इसीसे मानो अधिक चलता है । वास्तवमें तो वह आत्मज्योति चलनधर्मवाली नहीं है ।