भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 916, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 916
९०२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृतहिन्दी
कथं पुनरेतदवगम्यते, तत्समानत्वभ्रान्तिरेवोभयलोकसञ्चरणादिहेतुर्न स्वतः--इत्यस्यार्थस्य प्रदर्शनाय हेतुरुपदिश्यते—स आत्मा हि यस्मात् स्वप्नो भूत्वा, स यया धिया समानः, सा धीर्यद् यद् भवति तत्तदसावपि भवतीव; तस्माद् यदासौ स्वप्नो भवति स्वापवृत्तिं प्रतिपद्यते धीः, तदा सोऽपि स्वप्नवृत्तिं प्रतिपद्यते; यदा धीर्जिजागरिषति, तदा असावपि।<br><br>अत आह-स्वप्नो भूत्वा स्वप्नवृत्तिमवभासयन् धियः स्वापवृत्त्याकारो भूत्वेमं लोकं जागरितव्यवहारलक्षणं कार्यकारणसङ्घातात्मकं लौकिकशास्त्रीयव्यवहारास्पदम्, अतिक्रामत्यतीत्य क्रामति, विविक्तेन स्वेन आत्मज्योतिषा स्वप्नात्मिकां धीवृत्तिमवभासयन्न-किंतु यह कैसे जाना जाता है कि उन बुद्धि आदिकी समानताकी भ्रान्ति ही आत्माके दोनों लोकोंमें सञ्चारादि करनेका हेतु है, वह स्वतः सञ्चारादि नहीं करता-इसी अर्थको प्रदर्शित करनेके लिये हेतु बतलाया जाता है-'क्योंकि वह आत्मा ही स्वप्न होकर [ इस लोकका अतिक्रमण करता है ]।' वह जिस बुद्धिके समान होता है, वह बुद्धि जो-जो होती है, वही-वही मानो यह भी हो जाता है; इसलिये जिस समय वह स्वप्न होती है अर्थात् जिस समय बुद्धि स्वप्नवृत्तिको प्राप्त होती है, उस समय यह आत्मा भी स्वप्नवृत्तिको प्राप्त हो जाता है; और जिस समय बुद्धि जागनेकी इच्छा करती है उस समय यह भी जागना चाहता है।<br><br>इसलिये श्रुति कहती है—स्वप्न होकर-बुद्धिकी स्वप्नवृत्तिको प्रकाशित करता हुआ अर्थात् स्वप्नवृत्त्याकार होकर लौकिक एवं शास्त्रीय व्यवहारके योग्य इस देहेन्द्रियसङ्घातमय जागरित व्यवहाररूप लोकका अतिक्रमण कर जाता है अर्थात् इसको पार करके चला जाता है, उस समय चूँकि यह अपने विशुद्ध आत्मतेजसे बुद्धिकी स्वप्नात्मिका वृत्तिको प्रकाशित करता हुआ