बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 920, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 920
| ९०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| त्वमेव; पुनः पुनः संश्लेषे विश्लेषे च विशेषदर्शनाद्रज्जुघटयोरिव । अन्यत्वे च व्यतिरिक्तावभासकत्वम्; न स्वात्मनैव स्वात्मानमवभासयति । | से हैं भिन्न ही; क्योंकि रस्सी और घटके समान उनका पुनः-पुनः संयोग और वियोग होनेपर उनमें विशेषता दिखायी देती है। इस प्रकार यदि उनका भेद है तो प्रकाश्य पदार्थोंका कोई अन्य प्रकाशक है—यह भी सिद्ध हो जाता है; वे स्वयं ही अपनेको प्रकाशित नहीं करते। |
| (विज्ञानस्य स्वयंप्रकाशत्वे प्रदीपदृष्टान्तोपन्यासः)<br>ननु प्रदीपः स्वात्मानमेवावभासयन् दृष्ट इति न हि घटादिवत् प्रदीपदर्शनाय प्रकाशान्तरमुपाददते लौकिकाः; तस्मात् प्रदीपः स्वात्मानं प्रकाशयति । | **पूर्व०—**किंतु दीपक तो स्वयं ही अपनेको प्रकाशित करता देखा जाता है; क्योंकि लौकिक पुरुष घटादिके समान दीपकको देखनेके लिये कोई अन्य प्रकाश ग्रहण नहीं करते; इसलिये दीपक स्वयं ही अपनेको प्रकाशित करता है। |
| (तन्निरासनम्)<br>न, अवभास्यत्वाविशेषात्; यद्यपि प्रदीपोऽन्यस्यावभासकः स्वयमवभासात्मकत्वात्, तथापि व्यतिरिक्तचैतन्यावभास्यत्वं न व्यभिचरति, घटादिवदेव यदा चैवम्, तदा व्यतिरिक्तावभास्यत्वं तावदवश्यम्भावि । | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है; क्योंकि प्रकाश्यत्वमें दीपककी घटादिसे समानता है, यद्यपि स्वयं प्रकाशस्वरूप होनेके कारण दीपक दूसरोंका प्रकाशक है, तथापि घटादिके समान ही वह अपनेसे भिन्न चैतन्यद्वारा प्रकाशित होनेकी योग्यताका त्याग नहीं करता; जब कि ऐसी बात है, तो अपनेसे भिन्नसे प्रकाशित होना तो अनिवार्य ही है। |
| ननु यथा घटश्चैतन्यावभास्यत्वेऽपि व्यतिरिक्तमालोकान्त- | **पूर्व०—**किंतु जिस प्रकार चैतन्यसे अवभासित होने योग्य होनेपर भी घटको अपनेसे भिन्न दूसरे आलोककी |