भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 921, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 921

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
रमपेक्षते, न त्वेवं प्रदीपोऽन्यमालोकान्तरमपेक्षते; तस्मात् प्रदीपोऽन्यावभास्योऽपि सन्नात्मानं घटं चावभासयति ।अपेक्षा होती है, उस प्रकार दीपकको तो किसी अन्य प्रकाशकी अपेक्षा नहीं होती; अतः अन्यसे अवभासित होनेवाला होनेपर भी दीपक अपनेको और घटको प्रकाशित करता है ।
न, स्वतः परतो वा विशेषाभावात्—यथा चैतन्यावभास्यत्वं घटस्य, तथा प्रदीपस्यापि चैतन्यावभास्यत्वमविशिष्टम् ।सिद्धान्ती—नहीं, उसमें स्वतः अथवा परतः कोई भी विशेषता नहीं है; जिस प्रकार घट चैतन्यसे अवभासित होनेवाला है, उसी प्रकार उसके समान ही दीपक भी चैतन्यसे अवभासित होनेवाला है ।
यत्तूच्यते, प्रदीप आत्मानं घटं चावभासयतीति, तदसत्; कस्मात् ? यदा आत्मानं नावभासयति, तदा कीदृशः स्यात् ? न हि तदा प्रदीपस्य स्वतो वा परतो वा विशेषः कश्चिदुपलभ्यते; स ह्यवभास्यो भवति, यस्यावभासकसंनिधावसंनिधौ च विशेष उपलभ्यते; न हि प्रदीपस्य स्वात्मसन्निधिरसन्निधिर्वा शक्यः कल्पयितुम्; असति च कादा-तथा ऐसा जो कहा जाता है कि दीपक अपनेको और घटको भी प्रकाशित करता है; सो यह भी ठीक नहीं है; क्यों नहीं है ? सो बतलाते हैं—जिस समय दीपक अपनेको प्रकाशित नहीं करता, उस समय वह कैसा रहता है ? उस अवस्था में तो दीपकका अपनेसे अथवा अन्यसे कोई भी अन्तर नहीं देखा जाता; अवभास्य तो वही होता है, जिसमें अवभासककी सन्निधि अथवा असन्निधि होनेपर कोई अन्तर देखा जाय । किंतु दीपककी अपनेसे ही सन्निधि अथवा असन्निधि होनेकी कल्पना नहीं की जा सकती; अतः इस प्रकार कभी-कभी [ सन्निधि अथवा असन्निधिके कारण ] होनेवाले अन्तर-
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित) · पृष्ठ 921, कुल 1402 में से · BharatKosha