बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 922, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| चित्के विशेषे, आत्मानं प्रदीपः प्रकाशयतीति मृषैवोच्यते । | के न होनेपर 'दीपक अपनेको प्रकाशित करता है' ऐसा मिथ्या ही कहा जाता है । | | चैतन्यग्राह्यत्वं तु घटादिभिरविशिष्टं प्रदीपस्य; तस्माद् विज्ञानस्यात्मग्राह्यग्राहकत्वे न प्रदीपो दृष्टान्तः । चैतन्यग्राह्यत्वं च विज्ञानस्य बाह्यविषयैरविशिष्टम् । | दीपकका चैतन्यग्राह्य होना तो घटादिके समान ही है; अतः विज्ञानके अपने ही ग्राह्य और ग्राहक होनेमें दीपक दृष्टान्त नहीं हो सकता । हां, विज्ञानका चैतन्य ग्राह्य होना तो बाह्य विषयोंके समान ही है । | | चैतन्यग्राह्यत्वे च विज्ञानस्य, किं ग्राह्यविज्ञानग्राह्यतैव, किं वा ग्राहकविज्ञानग्राह्यतेति तत्र सन्दिह्यमाने वस्तुनि, योऽन्यत्र दृष्टो न्यायः स कल्पयितुं युक्तो न तु दृष्टविपरीत:; तथा च सति यथा व्यतिरिक्तेनैव ग्राहकेण बाह्यानां प्रदीपानां ग्राह्यत्वं दृष्टम् तथा विज्ञानस्यापि चैतन्यग्राह्यत्वात् प्रकाशकत्वे सत्यपि प्रदीपवद् व्यतिरिक्तचैतन्यग्राह्यत्वं युक्तं कल्पयितुम्, न त्वनन्यग्राह्यत्वम्; यश्चान्यो विज्ञानस्य ग्रहीता, स | विज्ञानकी चैतन्यग्राह्यता सिद्ध होनेपर भी क्या ग्राह्य (विषय-विषयक) विज्ञानकी ग्राह्यता है अथवा ग्राहक (विषयिविषयक) विज्ञानकी ? इस प्रकार वस्तुके विषयमें संदेह होनेपर जो न्याय अन्य पदार्थोंके विषयमें देखा गया है, उसीकी यहाँ भी कल्पना करनी चाहिये, दृष्टन्यायसे विपरीत कल्पना करनी उचित नहीं है; ऐसी स्थितिमें, जिस प्रकार अपनेसे व्यतिरिक्त ग्राहकके द्वारा बाह्य प्रदीपोंकी ग्राह्यता देखी गयी है, उसी प्रकार विज्ञानकी भो चैतन्यग्राह्यता होनेके कारण, प्रकाशक होनेपर भी दीपकके समान अपनेसे भिन्न चैतन्यद्वारा ही ग्राह्यता कल्पना करनी चाहिये, उसकी अनन्यग्राह्यता (विज्ञानग्राह्यता) माननी उचित नहीं है, इस प्रकार जो विज्ञानका ग्रहीता |