बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 923, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९०९
| संस्कृत | हिन्दी |
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| आत्मा ज्योतिरन्तरं विज्ञानात् । | है, वह आत्मा विज्ञानसे भिन्न ज्योति है। |
| तदानवस्थेति चेन्न, ग्राह्यत्वमात्रं हि तद्ग्राहकस्य वस्त्वन्तरत्वे लिङ्गमुक्तं न्यायतः; न त्वेकान्ततो ग्राहकत्वे तद्ग्राहकान्तरास्तित्वे वा कदाचिदपि लिङ्गं सम्भवति; तस्मान्न तदनवस्थाप्रसङ्गः । | यदि कहो कि तब तो अनवस्था हो जायगी, तो ऐसी बात नहीं है। किसी वस्तुका ग्राह्य होना ही उसके ग्राहकके अन्य पदार्थ होनेमें न्यायतः लिङ्ग कहा गया है; किंतु उस आत्माके अव्यभिचारी ग्राहकत्व और उसके किसी अन्यग्राहकके अस्तित्वमें कभी कोई लिङ्ग होना सम्भव नहीं है, इसलिये उस अनवस्थाका प्रसङ्ग नहीं हो सकता। |
| विज्ञानस्य व्यतिरिक्तग्राह्यत्वे करणान्तरापेक्षायामनवस्थेति चेन्न, नियमाभावात्—न हि सर्वत्रायं नियमो भवति; यत्र वस्त्वन्तरेण गृह्यते वस्त्वन्तरम्, तत्र ग्राह्यग्राहकव्यतिरिक्तं करणान्तरं स्यादिति नैकान्तेन नियन्तुं शक्यते, वैचित्र्यदर्शनात्; | यदि कहो कि विज्ञानको किसी अन्यसे ग्राह्य माननेपर इन्द्रियान्तरकी अपेक्षा होनेके कारण अनवस्था होगी तो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि ऐसा नियम नहीं है—सर्वत्र यही नियम नहीं होता, जहां किसी अन्य वस्तुसे कोई अन्य वस्तु ग्रहण की जाती है, वहां ग्राह्य और ग्राहकसे भिन्न कोई अन्य इन्द्रिय भी होनी चाहिये—ऐसा कोई अनिवार्य नियम नहीं किया जा सकता; क्योंकि इसमें विचित्रता |
| कथम् ? घटस्तावत् स्वात्मव्यतिरिक्तेनात्मना गृह्यते; तत्र प्रदीपादिरालोको ग्राह्यग्राहकव्यतिरिक्तं करणम्, न हि प्रदीपाद्यालोको | देखी जाती है; किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] घट अपनेसे भिन्न आत्माके द्वारा गृहीत होता ही है; वहां ग्राह्य और ग्राहकसे भिन्न प्रदीपादि प्रकाश उसका करण है; क्योंकि प्रदीपादिका |