भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 931, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 931

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९१७ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
स्तत्साहश्यप्रत्ययश्च; सर्वमन्धपरम्परेति प्रसज्येत सर्वज्ञशास्त्रप्रणयनादि; न चैतदिष्यते; अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशदोषौ तु प्रसिद्धतरौ क्षणवादे ।रूप-विशेषकथन और उसीका सादृश्यज्ञान होगा; तब तो सर्वज्ञ बुद्धके शास्त्रप्रणयनादि सब-के-सब अन्धपरम्परा ही हैं—ऐसा कहनेका प्रसंग होगा और यह बात इष्ट नहीं है; इस क्षणिकवादमें बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएका नाश—ये दो दोष तो अत्यन्त प्रसिद्ध हैं।
दृष्टव्यपदेशहेतुः पूर्वोत्तरसहित एक एव हि शृङ्खलावत् प्रत्ययो जायत इति चेत्, 'तेनेदं सदृशम्' इति च; न वर्तमानातीतयोर्भिन्नकालत्वात्—तत्र वर्तमानप्रत्यय एकः शृङ्खलावयवस्थानीयः, अतीतश्चापरः, तौ प्रत्ययौ भिन्नकालौ; तदुभयप्रत्ययविषयस्पृक् चेच्छृङ्खलाप्रत्ययः, ततः क्षणद्वयव्यापित्वादेकस्य विज्ञानस्य पुनः क्षणवादहानिः; ममतवतादिविशेषानुपपत्तेश्च सर्वसंव्यवहारलोपप्रसङ्गः ।पूर्वदृष्टके निर्देशका हेतु पूर्वोत्तर प्रत्ययसे युक्त शृङ्खलाके समान एक ही ज्ञान होता है तथा 'उसके समान यह है' ऐसा भी प्रत्यय होता है—यदि यह कहो तो ठीक नहीं, क्योंकि वर्तमान और भूत तो भिन्न काल हैं—उनमें शृङ्खलाका अवयवरूप एक वर्तमान प्रत्यय है और दूसरा अतीत प्रत्यय है। वे दोनों प्रत्यय भिन्नकालिक हैं; यदि वह शृङ्खलाके समान प्रत्यय उन दोनों प्रत्ययोंके विषयोंको स्पर्श करनेवाला है तो एक ही विज्ञानके दो क्षणोंमें व्यापक होनेके कारण पुनः क्षणिकवादकी हानि होती है तथा मेरा-तेरा आदि भेदकी उपपत्ति न होनेके कारण सम्पूर्ण व्यवहारके लोपका प्रसङ्ग उपस्थित होता है।
सर्वस्य च स्वसंवेद्यविज्ञानमात्रत्वे, विज्ञानस्य च स्वच्छावबो-सब स्वसंवेद्य विज्ञानमात्र होनेपर तथा विज्ञानको स्वच्छ ज्ञानप्रकाश-