बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 942, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| केन विधिना स्वपिति संध्यं स्थानं प्रतिपद्यते ? इत्युच्यते— अस्य दृष्टस्य लोकस्य जागरितलक्षणस्य, सर्वावतः सर्वमवतीति सर्वावानयं लोकः कार्यकरणसंघातो विषयवेदनासंयुक्तः, सर्वावत्त्वमस्य व्याख्यातमन्नत्रयप्रकरणे “अथो अयं वा आत्मा” इत्यादिना । सर्वा वा भूतभौतिकमात्रा अस्य संसर्गकारणभूता विद्यन्त इति सर्ववान्, सर्ववानेव सर्वावान्, तस्य सर्वावतो मात्रामेकदेशमवयवम्, अपादायापच्छिद्य आदाय गृहीत्वा—दृष्टजन्मवासनावासितः सन्नित्यर्थः स्वयमात्मनैव विहत्य देहं पातयित्वा निःसम्बोधमापाद्य—जागरिते ह्यादित्यादीनां चक्षुरादिष्वनुग्रहो देहव्यवहारार्थः, देहव्यवहारश्चात्मनो धर्माधर्मफलोपभोगप्रयुक्तः, तद्धर्माधर्मफलोपभोगोपरमणमस्मिन् देहे आत्मकर्मोपरमकृतमित्यात्मास्य | किस विधिसे सोता यानी संध्यस्थानको प्राप्त होता है ! सो बतलाया जाता है--इस जागरितरूप दृष्ट लोककी सर्वावान्--जो सबका अवन (पालन) करता है, वह यह लोक अर्थात् विषय एवं सुखदुःखादि वेदनायुक्त देहेन्द्रियसंघात, इसके सर्वावत्त्वकी व्याख्या “अथो अयं वा आत्मा” इत्यादि वाक्यद्वारा अन्नत्रयके प्रकरणमें कर दी गयी है । अथवा सम्पूर्ण भूत भौतिक मात्रा [अध्यात्मादि भागोंके साथ] इसके संसर्गकी कारणभूता है, इसलिये यह सर्ववान् है और सर्ववान् ही ‘सर्वावान्’ कहा गया है, उस सर्वावान्की मात्रा--एकदेश अर्थात् अवयवका अपादान--अपच्छेदन--आदान अर्थात् ग्रहण कर यानी दृष्ट जन्मकी वासनाओंसे सम्पन्न हो, स्वयं अर्थात् आप ही देहको विहत—चेतनाशून्य कर--जागरित अवस्थामें ही देहके व्यवहारके लिये चक्षु आदि इन्द्रियोंमें आदित्यादिका उपकार होता है और देहका व्यवहार आत्माके धर्मा-धर्मके फलोपभोगके कारण होता है, तथा इस देहमें वह धर्माधर्मके फलोपभोगकी उपरति आत्माके कर्मकी उपरतिका कारण है, इसलिये आत्मा |