भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 944, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 944
९३०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

नन्वस्य लोकस्य मात्रोपादानं कृतम्, कथं तस्मिन् सत्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवतीत्युच्यते ?<br><br>नैष दोषः; विषयभूतमेव हि तत्, तेनैव चात्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्दर्शयितुं शक्यः; न त्वन्यथासति विषये कस्मिंश्चित् सुषुप्तकाल इव; यदा पुनः सा भा वासनात्मिका विषयभूता उपलभ्यमाना भवति, तदा असिः कोशादिव निष्कृष्टः सर्वसंसर्गरहितं चक्षुरादिकार्यकरणव्यावृत्तस्वरूपमलुप्तदृगात्मज्योतिः स्वेन रूपेणावभासयद् गृह्यते। तेनात्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवतीति सिद्धम् ॥९॥शङ्का— किंतु इसने तो इस लोककी [विषय-वेदनासंयुक्त] मात्राको ग्रहण किया है; फिर उसके रहते हुए यह पुरुष स्वयंज्योति होता है—ऐसा कैसे कहा जाता है ?<br><br>समाधान— यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि वह मात्रा तो विषयभूता ही होती है। इसीलिये यहाँ यह पुरुष [ आत्मा ] 'स्वयंज्योतिः' स्वरूपसे दिखाया जा सकता है, नहीं तो सुषुप्तावस्थाके समान, जब कि कोई भी विषय नहीं रहता, इस स्वयंज्योतिका दर्शन नहीं कराया जा सकता। और जिस समय कि वह वासनात्मिका ज्योति विषयभूता होकर उपलब्ध होती है, उस समय म्यानसे निकाली हुई तलवारके समान सर्वसंसर्गशून्य, चक्षु आदि कार्य-करणसे व्यावृत्तस्वरूप तथा जिसके बोध-स्वभावका कभी लोप नहीं होता, वह आत्मज्योति अपने स्वरूपसे प्रकाश करती हुई स्वयं गृहीत होती है। अतः यह सिद्ध हुआ कि इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंज्योति होता है ॥ ९॥

स्वप्नावस्थामें रथादिका अभाव है, इसलिये उस समय आत्मा स्वयंज्योति है

नन्वत्र कथं पुरुषः स्वयंज्योतिर्येन जागरित इव ग्राह्यग्राहका-शङ्का— किंतु इस अवस्थामें पुरुष स्वयंज्योति कैसे हो सकता है? क्योंकि जागरितके समान इस समय