भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 946, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 946
९३२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते न तत्रानन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान्मुदः प्रमुदः सृजते । न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिणीः स्रवन्तीः सृजते स हि कर्ता ॥ १० ॥

उस अवस्था में न रथ हैं, न रथमें जोते जानेवाले [अश्वादि] हैं और न मार्ग ही हैं। परंतु वह रथ, रथमें जोते जानेवाले [अश्वादि] और रथके मार्गोंकी रचना कर लेता है। उस अवस्था में आनन्द, मोद और प्रमोद भी नहीं हैं, किंतु वह आनन्द, मोद और प्रमोदकी रचना कर लेता है। वहाँ छोटे-छोटे कुण्ड, सरोवर और नदियाँ नहीं हैं; वह कुण्ड, सरोवर और नदियोंकी रचना कर लेता है—वही उनका कर्ता है ॥ १० ॥

| न तत्र विषयाः स्वप्ने रथादिलक्षणाः; तथा न रथयोगाः, रथेषु युज्यन्ते इति रथयोगा अश्वादयः, तत्र न विद्यन्ते; न च पन्थानो रथमार्गा भवन्ति । अथ रथान् रथयोगान् पथश्च सृजते स्वयम् । | वहाँ—उस स्वप्नावस्था में रथादिरूप विषय नहीं हैं और न रथयोग हैं, जो रथमें जोते जाते हैं, वे रथयोग अर्थात् अश्वादि वहाँ मौजूद नहीं हैं; और न पथ-रथके मार्ग ही हैं। किंतु यह रथ, रथयोग और मार्गोंकी स्वयं रचना कर लेता है। | | कथं पुनः सृजते रथादिसाधनानां वृक्षादीनामभावे ? | शङ्का—किंतु रथादिके साधन वृक्षादिका अभाव होनेपर भी यह उनकी रचना कैसे कर लेता है ? | | उच्यते—ननूक्तम् 'अस्य लोकस्य सर्ववतो मात्रामपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय' इति; अन्तःकरणवृत्तिरस्य लोकस्य वासना- | समाधान—बतलाते हैं, ऐसा कहा हे न कि 'इस सर्वावान् लोककी मात्राको लेकर अपनेको चेतनाशून्य कर तथा दूसरा शरीर रचकर' इत्यादि; सो अन्तःकरणकी वृत्ति ही इस |