भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 948, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 948
९३४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
भवन्ति; अथ वेशान्तादीन् सृजते| वासनामात्ररूपान्, यस्मात् स हि कर्ता; तद्वासनाश्रयचित्तवृत्त्युद्भवनिमित्तकर्महेतुत्वेनेत्यवोचाम तस्य कर्तृत्वम्; न तु साक्षादेव तत्र क्रिया सम्भवति, साधनाभावात्।है; किंतु यह उन वासनामात्ररूपी पल्वलादिकी रचना कर लेता है क्योंकि वही कर्ता है; उन विषयोंकी वासनाकी आश्रयभूता जो चित्तवृत्ति है उसके परिणामके कारण होनेवाले जो कर्म हैं, उनके कारण ही उसका कर्तृत्व बतलाया गया है, साक्षात्रूपसे ही उसमें क्रियाका होना सम्भव नहीं है; क्योंकि उसके पास क्रियाके साधनोंका अभाव है।
न हि कारकमन्तरेण क्रिया सम्भवति; न च तत्र हस्तपादादीनि क्रियाकारकाणि सम्भवन्ति; यत्र तु तानि विद्यन्ते जागरिते, तत्र आत्मज्योतिरवभासितैः कार्यकारणै रथादिवासनाश्रयान्तःकरणवृत्त्युद्भवनिमित्तं कर्म निर्वर्त्यते; तेनोच्यते—स हि कर्तेति;कारकके बिना क्रियाका होना सम्भव नहीं है और वहां क्रियाके कारक हाथ-पैर आदि हैं नहीं; जहाँ जागरित-अवस्थामें वे रहते हैं वहाँ आत्मज्योतिसे प्रकाशित देह और इन्द्रियोंके द्वारा रथादिकी वासनाओंकी आश्रयभूता अन्तःकरणकी वृत्तिका उत्थानसे होनेवाला कर्म निष्पन्न हो सकता है, इसीसे ऐसा कहा जाता है कि वही कर्ता है।
तदुक्तम्—'आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते' इति;और इसीसे 'वह आत्मज्योतिसे ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और फिर लौट आता है'
तत्रापि न परमार्थतः स्वतः कर्तृत्वं चैतन्यज्योतिषोऽवभासकत्वव्यतिरेकेण- यच्चैतन्यात्मज्योतिषा-ऐसा कहा है; वहाँ भी अवभासक होनेके सिवा इस चैतन्यज्योतिका वास्तवमें स्वतः कोई कर्तृत्व नहीं है; क्योंकि आत्मा अन्तःकरणके द्वारा चैतन्यात्म-
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