बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 953, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 953
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३९
| र्भितम् आक्रीडनरूपम्; न तं पश्यति तं न पश्यति कश्चन। कष्टं भो वर्ततेऽत्यन्तविविक्तं दृष्टिगोचरापन्नमपि—अहो भाग्यहीनता लोकस्य; यच्छक्यदर्शनमप्यात्मानं न पश्यति—इति लोकं प्रत्यनुक्रोशं दर्शयति श्रुतिः। अत्यन्तविविक्तः स्वयंज्योतिरात्मा स्वप्ने भवतीत्यभिप्रायः। | आक्रीडनके रूपको देखते हैं; उसे नहीं देखते—उस आत्माको कोई नहीं देखता। अहो ! बड़ा कष्ट है; जो अत्यन्त भिन्न और दृष्टिकी विषयता को प्राप्त है, जिसका दर्शन भी किया जा सकता है, उस आत्माको कोई नहीं देखता। अहो! जीवोंका कैसा दुर्भाग्य है ? इस प्रकार जीवोंके प्रति श्रुति करुणा प्रदर्शित करती है। तात्पर्य यह है कि स्वप्नावस्थामें यह स्वयंज्योति आत्मा अत्यन्त संसर्गशून्य हो जाता है। |
| तं नायतं बोधयेदित्याहुः—प्रसिद्धिरपि लोके विद्यते, स्वप्न आत्मज्योतिषो व्यतिरिक्तत्वे; कासौ? तमात्मानं सुप्तम्, आयतं सहसा भृशम्, न बोधयेत्—इत्याहुरेवं कथयन्ति चिकित्सकादयो जना लोके; नूनं ते पश्यन्ति—जाग्रद्देहादिन्द्रियद्वारतोऽपसृत्य केवलो बहिर्वर्तत इति, यत आहुः—तं नायतं बोधयेदिति। | 'तं नायतं बोधयेदित्याहुः'—स्वप्नमें आत्मज्योतिकी व्यतिरिक्तताके विषयमें लोकमें प्रसिद्धि भी है; वह प्रसिद्धि क्या है—उस सोये हुए आत्माको आयतम्—सहसा—एकाएकी न जगावे ऐसा चिकित्सकादि लोग लोकमें कहते हैं। निश्चय ही वे देखते हैं कि आत्मा जाग्रद्देहसे उसके इन्द्रियरूप द्वारसे निकलकर विशुद्धरूपसे बाहर विद्यमान है; इसीसे 'उसे सहसा न जगावे' ऐसा कहते हैं। |
| तत्र च दोषं पश्यन्ति—भृशं ह्यसौ बोध्यमानस्तानीन्द्रियद्वाराणि सहसा प्रतिबोध्यमानो न प्रतिप- | उसमें वे यह दोष भी देखते हैं—सहसा जगाये जानेपर वह एकाएकी जगाया हुआ उन इन्द्रियद्वारोंको प्राप्त |