बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 979, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 979
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६५ |
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| मूल संस्कृत भाष्यार्थ | हिन्दी अनुवाद |
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| राज्यस्थोऽभिषिक्तः स्वप्नेऽपि राजाहमिति मन्यते राजवासना-वासितः । | [ तात्पर्य यह है कि ] जागरित-अवस्थामें अभिषेकपूर्वक राज्यपर स्थित हुआ पुरुष उस राजवासना-से युक्त होनेके कारण स्वप्नमें भी 'मैं राजा हूँ' ऐसा मानता है । |
| एवमत्यन्तप्रक्षीयमाणाविद्या उद्भूता च विद्या सर्वात्मविषया यदा, तदा स्वप्नेऽपि तद्भाव-भावितः—अहमेवेदं सर्वोऽस्मीति मन्यते; स यः सर्वात्मभावः, सोऽस्यात्मनः परमो लोकः परम आत्मभावः स्वाभाविकः । | इसी प्रकार जब अविद्या अत्यन्त क्षीण हो जाती है और सर्वात्म-विषयिणी विद्याका उद्भव हो जाता है, उस समय उस भावसे भावित रहनेके कारण वह स्वप्नमें भी 'मैं ही यह सर्वरूप हूँ' ऐसा मानता है; यह जो सर्वात्मभाव है, वह इस आत्माका परम लोक-स्वाभाविक परम आत्मभाव है । |
| (विद्याविद्योर्भेदः) यत्तु सर्वात्मभावादर्वाग् वालाग्रमात्रमप्यन्यत्वेन दृश्यते—नाहमस्मीति, तदवस्थाविद्या; तया अविद्यया ये प्रत्युपस्थापिता अनात्मभावा लोकाः, तेऽपरमाः स्थावरान्ताः; तान् संव्यवहारविषयाँल्लोकानपेक्ष्यायं सर्वात्मभावःसमस्तोऽनन्तरोऽबाह्यः, सोऽस्य परमो लोकः । तस्मादपकृष्यमाणायामविद्यायां विद्यायां च काष्ठां गतायां सर्वात्मभावो मोक्षः,यथा स्वयंज्योतिष्ट्वं स्वप्ने प्रत्यक्षत उपलभ्यते तद्वद् विद्याफलमुपलभ्यत इत्यर्थः । | और जो सर्वात्मभावसे उतर-कर अपनेको वालाग्रमात्र भी 'मैं यह नहीं हूँ' इस प्रकार अन्यरूपसे देखता है, वह अवस्था अविद्या है, उस अविद्याद्वारा प्रस्तुत किये गये जो अनात्मभाव हैं, वे स्थावरपर्यन्त लोक अपरम हैं; उन व्यवहारविषयक लोकोंकी अपेक्षा यह सर्वात्मभाव पूर्ण तथा अन्तर-बाह्यशून्य है, वह इसका परम लोक है; अतः अविद्याका अपकर्ष और विद्याकी पराकाष्ठा होनेपर सर्वात्मभावकी प्राप्ति ही मोक्ष है, तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्वप्नमें आत्माका स्वयंप्रकाशत्व प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है, उसी प्रकार विद्याके फल मोक्षकी प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है । |