बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 980, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| तथाविद्यायामप्युत्कृष्यमाणायाम्, तिरोधीयमानायां च विद्यायाम्, अविद्यायाः फलं प्रत्यक्षत एवोपलभ्यते—'अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव' इति। ते एते विद्याविद्याकार्ये सर्वात्मभावः परिच्छिन्नात्मभावश्च; विद्यया शुद्धया सर्वात्मा भवति; अविद्यया चासर्वो भवति; अन्यतः कुतश्चित् प्रविभक्तो भवति; यतः प्रविभक्तो भवति, तेन विरुध्यते; विरुद्धत्वाद् हन्यते जीयते विच्छाद्यते च। असर्वविषयत्वे च भिन्नत्वादेतद् भवति; समस्तस्तु सन् कुतो भिद्यते येन विरुध्येत; विरोधाभावे केन हन्यते जीयते विच्छाद्यते च ? | इसी प्रकार अविद्याका उत्कर्ष और विद्याका तिरोभाव होनेपर भी 'जिस समय मानो इसे कोई मारते हैं अथवा वशमें करते हैं' इत्यादि रूपसे अविद्याका फल प्रत्यक्ष ही उपलब्ध होता है। वे ये सर्वात्मभाव और परिच्छिन्नात्मभाव क्रमशः विद्या और अविद्याके कार्य हैं; शुद्ध विद्यासे पुरुष सर्वात्मा हो जाता है और अविद्यासे असर्व होता है; वह किसी अन्यसे विभक्त हो जाता है और जिससे विभक्त होता है, उससे विरुद्ध रहता है तथा विरुद्ध रहनेके कारण मारा जाता है, जीता जाता है तथा खदेड़ा जाता है। असर्वका विषय रहनेपर ही भिन्न होनेके कारण यह सब होता है; यदि सर्वरूप रहता तो किससे भिन्न होता, जिससे कि उसका विरोध हो सकता और विरोध न होनेपर वह किसके द्वारा मारा जाता, जीता जाता अथवा खदेड़ा जाता ? | | अत इदमविद्यायाः सतत्त्वमुक्तं भवति—सर्वात्मानं सन्तमसर्वात्मत्वेन ग्राहयति, आत्मनोऽन्यद् वस्त्वन्तरमविद्यमानं प्रत्युपस्थापयति आत्मानमसर्वमापादयति; | अतः यह अविद्याका स्वभाव बतलाया जाता है कि पुरुष सर्वात्मा होते हुए अपनेको असर्वात्मरूपसे ग्रहण कराता है, आत्मासे भिन्न कोई दूसरी वस्तु न होनेपर भी उसे उपस्थित करता है तथा आत्माको असर्वरूप बना देता है; फिर |