बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 981, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 981
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६७ |
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| संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी अनुवाद |
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| ततस्तद्विषयः कामो भवति यतोऽभिद्यते, कामतः क्रियामुपादत्ते ततः फलम्—तदेतदुक्तं वक्ष्यमाणं च—'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति' इत्यादि ।<br><br>इदमविद्यायाः सतत्त्वं सह कार्येण प्रदर्शितम्; विद्यायाश्च कार्यं सर्वात्मभावः प्रदर्शितोऽविद्याया विपर्ययेण । सा चाविद्या नात्मनः स्वाभाविको धर्मः—यस्माद् विद्यायामुत्कृष्यमाणायां स्वयमपचीयमाना सती, काष्ठां गतायां विद्यायां परिनिष्ठिते सर्वात्मभावे सर्वात्मना निवर्तते, रज्ज्वामिव सर्पज्ञानं रज्जुनिश्चये । तच्चोक्तम्—"यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत् केन कं पश्येत्" (बृ० उ० ४ । ५ । १५) इत्यादि; तस्मान्नात्मधर्मोऽविद्या; न हि स्वाभाविकस्योच्छित्तिः कदाचिदप्युपपद्यते, सवितुरिवौष्ण्यप्रकाशयोः । तस्मात् तस्या मोक्ष उपपद्यते ॥२०॥ | जिससे भेद मानता है, उसके विषयमें कामना होती है, कामनासे क्रिया स्वीकार करता है और उससे फल होता है, इसीसे यह कहा है और आगे कहा भी जायगा कि 'जहाँ द्वैत-सा होता है, वहीं अन्य अन्यको देखता है' इत्यादि ।<br><br>यह अविद्याका स्वरूप उसके कार्यके सहित दिखाया गया तथा अविद्याके विपरीतरूपसे विद्याका कार्य सर्वात्मभाव दिखाया गया । वह अविद्या आत्माका स्वाभाविक धर्म नहीं है, क्योंकि विद्याका उत्कर्ष होनेपर वह स्वयं क्षीण होने लगती है और जिस समय विद्याकी परात्मभावकी पूर्ण प्रतिष्ठा हो जाती है, उस समय रज्जुका निश्चय होनेपर रज्जुमें सर्पज्ञानके समान उसकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है । ऐसा ही कहा भी है—"जहां इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहां किसके द्वारा क्या देखे ?" इत्यादि; इसलिये अविद्या आत्माका धर्म नहीं है, क्योंकि सूर्यके उष्णता और प्रकाशके समान स्वाभाविक धर्मोंका कभी उच्छेद नहीं हो सकता । अतः उससे मोक्ष होना सम्भव है ॥ २० ॥ |