बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 992, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| ब्राह्मणसुवर्णहर्ता, भ्रूणघ्ना सह पाठादवगम्यते—स तेन घोरेण कर्मणैतस्मिन् काले विनिर्मुक्तो भवति, येनायं कर्मणा महापातकी स्तेन उच्यते । | ब्राह्मणका सुवर्ण चुरानेवाला, यह, बात स्तेन शब्दका भ्रूणहाके साथ पाठ होनेसे जानी जाती है,¹ वह इस कालमें उस घोर कर्मसे मुक्त हो जाता है, जिस कर्मके कारण कि यह महापापी स्तेन ( चोर ) कहा जाता है । | | तथा भ्रूणहाऽभ्रूणहा; तथा चाण्डालो न केवलं प्रत्युत्पन्नेनैव कर्मणा विनिर्मुक्तः, किं तर्हि ? सहजेनाप्यत्यन्त निकृष्टजातिप्रापकेणापि विनिर्मुक्त एवायम्, चाण्डालो नाम शूद्रेण ब्राह्मण्यामुत्पन्नश्चण्डाल एव चाण्डालः, स जातिनिमित्तेन कर्मणाऽसम्बद्धत्वादचाण्डालो भवति । पौल्कसः, पुल्कस एव पौल्कसः, शूद्रेणैव क्षत्रियायामुत्पन्नः, सोऽप्यपौल्कसो भवति । | इसी प्रकार भ्रूणहत्या ( श्रेष्ठ ब्राह्मणकी हत्या ) करनेवाला अभ्रूणहा हो जाता है; तथा चाण्डाल केवल आगन्तुक कर्मसे ही मुक्त नहीं होता, तो फिर क्या-क्या होता है ? वह अत्यन्त निकृष्ट जातिकी प्राप्ति करानेवाले अपने स्वाभाविक कर्मसे भी मुक्त हो जाता है; चाण्डाल--शूद्रसे ब्राह्मणीमें उत्पन्न हुए चण्डालको कहते हैं, वह चण्डाल ही चाण्डाल है । वह अपने जाति सम्बन्धी कर्मसे असम्बद्ध होनेके कारण अचाण्डाल हो जाता है । पौल्कस – शूद्रसे क्षत्राणीमें उत्पन्न हुआ पुल्कस ही पौल्कस कहलाता है; वह भी अपौल्कस हो जाता है । | | तथा आश्रमलक्षणैश्च कर्मभिरसम्बद्धो भवतीत्युच्यते, श्रमणः | इसी प्रकार पुरुष आश्रमसम्बन्धी कर्मोंसे भी असम्बद्ध हो जाता है, सो बतलाते हैं-श्रमण अर्थात् जिस |
१. 'भ्रूणहा' श्रेष्ठ ब्राह्मणकी हत्या करनेवालेको कहते हैं, इसलिये 'स्तेन' शब्दसे भी साधारण चोर न समझकर ब्राह्मणका सुवर्ण चुरानेवाला समझना चाहिये ।