भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 996, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 996
९८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
विशेषणात् । न हि हृदयस्य करणमात्रत्वे ‘हृदि श्रिताः’ इति वचनं समञ्जसम्, ‘हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि’ इति च । आत्मविशुद्धेश्च विवक्षितत्वाद्धृच्छ्रयणवचनं यथार्थमेव युक्तम्; ‘ध्यायतीव लेलायतीव’ इति च श्रुतेरन्यथाऽसम्भवात् ।ऐसा विशेषण दिया गया है । यदि हृदय उनकी उत्पत्तिका करणमात्र ही हो तो ‘हृदि श्रिताः’ तथा ‘हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि’ ये वचन यथार्थ नहीं हो सकते; किंतु यहाँ आत्माकी विशुद्धि विवक्षित होनेके कारण उनका हृदयाश्रयत्व बतलाना यथार्थ एवं उचित ही है, क्योंकि ‘ध्यायतीव लेलायतीव’ इस श्रुतिका कोई दूसरा अर्थ होना सम्भव नहीं है ।
‘कामा येऽस्य हृदि श्रिताः’ इति विशेषणादात्माश्रया अपि सन्तीति चेन्न, अनाश्रितापेक्षत्वात् — नात्र आश्रयान्तरमपेक्ष्य ये हृदीति विशेषणम्, किं तर्हि ? ये हृद्यनाश्रिताः कामास्तानपेक्ष्य विशेषणम् । ये त्वप्ररूढा भविष्या भूताश्च प्रतिपक्षतो निवृत्तास्ते नैव हृदि श्रिताः । सम्भाव्यन्तेयदि कहो ‘जो काम इसके हृदयमें स्थित हैं’ ऐसा विशेषण देनेसे ज्ञात होता है कि कुछ काम आत्माके आश्रित भी हैं, तो यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि यह हृदयमें अनाश्रित कामोंकी अपेक्षासे है— यहाँ ‘ये हृदि’ ऐसा विशेषण कामोंके किसी अन्य आश्रयकी अपेक्षासे नहीं है, तो किस कारणसे है ? जो काम हृदयके आश्रित नहीं हैं, उनकी अपेक्षासे यह विशेषण है। भविष्यमें होनेवाले जो काम हृदयमें आरूढ नहीं हैं, तथा जो भूतकालमें होकर विरोधके कारण निवृत्त हो गये हैं, वे हृदयमें स्थित नहीं हैं । उनकी भी सम्भावना