बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 997, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९८३
| च ते, अतो युक्तं तानपेक्ष्य विशेषणम्—ये प्ररूढा वर्तमाना विषये ते सर्वे प्रमुच्यन्त इति । | हो सकती थी, इसलिये उनकी अपेक्षासे ऐसा विशेषण देना कि 'जो आरूढ अर्थात् विषयमें विद्यमान हैं वे सब ही मुक्त हो जाते हैं,' उचित हो है । | | तथापि विशेषणानर्थक्यमिति चेन्न, तेषु यत्नाधिक्याद् हेयार्थत्वात् । इतरथा अश्रुतमनिष्टं च कल्पितं स्यादात्माश्रयत्वं कामानाम् । | यदि कहो ऐसा माननेपर भी यह विशेषण निरर्थक है तो ठीक नहीं, क्योंकि हृदयारूढ़ काम ही हेय हैं, कारण कि उन्हींकी निवृत्तिके लिये अधिक यत्नकी आवश्यकता होती है। यदि यह विशेषण न दिया गया होता तो 'कामनाएँ आत्माके आश्रित हैं' ऐसी कल्पना होती, जिसका न तो श्रुतिमें ही प्रतिपादन हुआ है और न उसको मानना इष्ट ही है। | | 'न कञ्चन कामं कामयते' इति प्राप्तप्रतिषेधादात्माश्रयत्वं कामानां श्रुतमेवेति चेन्न, 'सधीः स्वप्नो भूत्वा' इति परनिमित्तत्वात् कामाश्नयत्वप्राप्तेः । असङ्गवचनाच्च; न हि कामाश्नयत्वेऽसङ्गवचनमुपपद्यते, सङ्गश्च काम इत्यवोचाम । | प्रतिषेध प्राप्त वस्तु का ही होता है, अतः 'किसी कामकी कामना नहीं करता' ऐसा प्रतिषेध होनेके कारण कामोंका आत्माश्रयत्व तो श्रुतिसम्मत ही है—ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं, क्योंकि 'बुद्धिके सहित स्वप्न होकर' इस वाक्यके अनुसार आत्माको कामाश्नयत्वकी प्राप्ति अन्य (बुद्धि) के कारण है। आत्माको असङ्ग बतलानेसे भी यही सिद्ध होता है; कामका आश्रयभूत होनेपर तो आत्माको असङ्ग कहना उचित नहीं हो सकता, सङ्ग ही काम है—ऐसा हम कह चुके हैं। |