छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 114, कुल 978 में से
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११० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
'सामकी गति ( आश्रय ) क्या है ?' इसपर दूसरेने 'स्वर' ऐसा कहा। 'स्वरकी गति क्या है ?' ऐसा प्रश्न होनेपर दूसरेने 'प्राण' ऐसा कहा। 'प्राणकी गति क्या है ?' इसपर दूसरेने 'अन्न' ऐसा कहा। तथा 'अन्नकी गति क्या है ?' ऐसा पूछे जानेपर दाल्भ्यने 'बल' ऐसा कहा ॥४॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| का साम्नः प्रकृतत्वादुद्गीथस्य। उद्गीथो ह्यत्रोपास्यत्वेन प्रकृतः। “परोवरीयांसमुद्गीथम्” ( १।९।२ ) इति च वक्ष्यति। गतिराश्रयः परायणमित्येतत्। एवं पृष्टो दाल्भ्य उवाच—स्वर इति; स्वरात्मकत्वात्साम्नः। यो यदात्मकः स तद्गतिस्तदाश्रयश्च भवतीति युक्तं मृदाश्रय इव घटादिः। | सामकी—प्रकरणप्राप्त होनेके कारण उद्गीथकी गति—आश्रय अर्थात् परायण क्या है ? क्योंकि यहाँ उपास्यरूपसे उद्गीथका ही प्रकरण है, जैसा कि ‘परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते’ ( १।९।२ ) इत्यादि श्रुतिमें कहेंगे भी। इस प्रकार पूछे जानेपर दाल्भ्यने कहा—‘स्वर’ क्योंकि साम स्वरस्वरूप है। जिस प्रकार [मृत्तिकामय] घटादि पदार्थोंका मृत्तिका ही आश्रय होती है, उसी प्रकार जो पदार्थ यदात्मक—जिसके स्वरूपसे युक्त होता है उस पदार्थकी वही गति और आश्रय भी होता है—यह उचित ही है। |
| स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच। प्राणनिष्पाद्यो हि स्वरस्तस्मात्स्वरस्य प्राणो गतिः। प्राणस्य का गतिरित्यन्नमिति होवाच। अन्नावष्टम्भो हि प्राणः। “शुष्यति वै प्राण | ‘स्वरकी गति क्या है ?’ ऐसा प्रश्न होनेपर [दाल्भ्यने] ‘प्राण’ ऐसा कहा, क्योंकि स्वर प्राणसे ही निष्पन्न होनेवाला है, इसलिये स्वरकी गति प्राण है। ‘प्राणकी गति क्या है ?’ ऐसा पूछे जानेपर उसने कहा ‘अन्न’, क्योंकि प्राण अन्नके ही आश्रय रहनेवाला है, जैसा कि |