भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 117

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
ब्रूयात्कश्चिद्विपरीतविज्ञानमप्रतिष्ठितं साम प्रतिष्ठितमिति एवं वादापराधिनं मूर्धा शिरस्ते विपतिष्यति विस्पष्टं पतिष्यतीति । एवमुक्तस्यापराधिनस्तथैव तद्विपतेन्न संशयो न त्वहं ब्रवीमीत्यभिप्रायः ।है' इस प्रकार कहनेका अपराध करनेवाले तुझ विपरीत विज्ञानवान्से कहे कि 'तेरा मस्तक गिर जायगा—स्पष्टतया पतित हो जायगा' तो इस प्रकार कहे जानेपर तुझ अपराधीका मस्तक उसी प्रकार गिर पड़ेगा—इसमें संशय नहीं। तात्पर्य यह है कि मैं तो ऐसा कहता नहीं हूँ [यदि कोई अन्य कह देगा तो अवश्य ऐसा ही होगा]।'
ननु मूर्धपातार्हं चेदपराधं कृतवानतः परेणानुक्तस्यापि पतेन्मूर्धा न चेदपराध्युक्तस्यापि नैव पतति । अन्यथाकृताभ्यागमः कृतनाशश्च स्याताम् ।शंका—यदि मस्तक गिरनेयोग्य पाप किया है तब तो दूसरेके न कहनेपर भी मस्तक गिर ही जायगा और यदि वह ऐसा अपराधी नहीं है तो कहनेपर भी नहीं गिर सकता; नहीं तो बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएका नाश ये दो दोष प्राप्त होंगे।
नैष दोषः; कृतस्य कर्मणः शुभाशुभस्य फलप्राप्तेर्देशकालनिमित्तापेक्षत्वात् । तत्रैवं सति मूर्धपातनिमित्तस्याप्यज्ञानस्य पराभिव्याहारनिमित्तापेक्षत्वमिति ॥ ६ ॥समाधान—यह दोष नहीं है, क्योंकि किये हुए शुभ और अशुभ कर्मोंके फलकी प्राप्ति देश, काल और निमित्तकी अपेक्षावाली होती है । ऐसी स्थितिमें मूर्धपातका निमित्तभूत जो अज्ञान है, वह भी दूसरेके कथनरूप निमित्तकी अपेक्षावाला ही है ॥ ६ ॥