भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 118
११४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १
एवमुक्तो दाल्भ्य आह—ऐसा कहे जानेपर दाल्भ्यने कहा—

हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवा-
चामुष्य लोकस्य का गतिरित्ययं लोक इति होवा-
चास्य लोकस्य का गतिरिति न प्रतिष्ठां लोकमति-
नयेदिति होवाच प्रतिष्ठां वयं लोकꣳसामाभिसꣳस्था-
पयामः प्रतिष्ठासꣳस्तावꣳहि सामेति ॥ ७ ॥

मैं यह बात श्रीमान्‌से जानना चाहता हूँ; इसपर [शिलकने] कहा—'जान लो।' तब 'उस लोककी गति क्या है?' ऐसा पूछे जानेपर उसने 'यह लोक' ऐसा कहा। फिर 'इस लोककी गति क्या है?' ऐसा प्रश्न होनेपर 'इस प्रतिष्ठाभूत लोकका अतिक्रमण करके सामको अन्यत्र नहीं ले जाना चाहिये' ऐसा कहा। हम प्रतिष्ठाभूत इस लोकमें सामको स्थित करते हैं [अर्थात् यहीं उसकी चरम स्थितिका निश्चय करते हैं]; क्योंकि सामका प्रतिष्ठारूपसे ही स्तवन किया गया है॥ ७ ॥

हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानि यत्प्रतिष्ठं सामेत्युक्तः प्रत्युवाच शालावत्यो विद्धीति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति पृष्टो दाल्भ्येन शालावत्योऽयं लोक इति होवाच। अयं हि लोको यागदानहोमादिभिरमुं लोकं पुष्यतीति। "अतः प्रदानं देवा उपजीवन्ति"'जिसमें साम प्रतिष्ठित है यह बात मैं श्रीमान्‌से जानना चाहता हूँ' ऐसा कहे जानेपर शालावत्यने उत्तर दिया—'जान लो।' 'उस लोककी गति क्या है?' इस प्रकार दाल्भ्यसे पूछे जानेपर शालावत्यने 'यह लोक' ऐसा कहा; क्योंकि यह लोक ही याग, दान और होमादिके, द्वारा उस लोकका पोषण करता है। इस विषयमें "अतः दानके आश्रयसे देवगण जीवित रहते हैं"