छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 119, कुल 978 में से
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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
| इति हि श्रुतयः । प्रत्यक्षं हि सर्वभूतानां धरणी प्रतिष्ठेति । अतः साम्नोऽप्ययं लोकः प्रतिष्ठैवेति युक्तम् । | ऐसी श्रुतियाँ भी हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंकी प्रतिष्ठा पृथिवी है—यह प्रत्यक्ष ही है। अतः सामकी भी यही लोकप्रतिष्ठा है—ऐसा मानना उचित ही है। |
|---|---|
| अस्य लोकस्य का गतिः ? इत्युक्त आह शालावत्यः । न प्रतिष्ठामिमं लोकमतीत्य नयेत्साम कश्चित् । अतो वयं प्रतिष्ठां लोकं सामाभिसंस्थापयामः । यस्मात्प्रतिष्ठासंस्तावं हि प्रतिष्ठात्वेन संस्तुतं सामेत्यर्थः । "इयं वै रथन्तरम्" इति च श्रुतिः ॥ ७ ॥ | 'इस लोककी गति क्या है?' इस प्रकार पूछे जानेपर शालावत्यने कहा—'किसीको भी प्रतिष्ठाभूत इस लोकका अतिक्रमण करके सामको अन्यत्र नहीं ले जाना चाहिये, अतः हम प्रतिष्ठाभूत इस लोकमें ही सामको सब प्रकारसे स्थापित करते हैं, क्योंकि साम प्रतिष्ठासंस्ताव—प्रतिष्ठारूपसे स्तुत है । "यह [ पृथिवी ] ही रथन्तर साम है" ऐसी श्रुति भी है ॥ ७ ॥ |
तꣳह प्रवाहणो जैविलिरुवाचान्तवद्वै किल ते शालावत्य साम यस्त्वैतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाच ॥ ८ ॥
तब उससे जीवलके पुत्र प्रवाहणने कहा—'हे शालावत्य ! निश्चय ही तुम्हारा साम अन्तवान् है । यदि कोई ऐसा कह दिया कि तुम्हारा मस्तक गिर जाय तो तुम्हारा मस्तक गिर जाता।' [शालावत्यने कहा—] 'मैं इसे श्रीमान्से जानना चाहता हूँ।' इसपर प्रवाहणने 'जान लो' ऐसा कहा ॥ ८ ॥