छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवम खण्ड
शिलककी उक्ति—आकाश ही सबका आश्रय है
| इतरोऽनुज्ञात आह— | प्रवाहणकी अनुमति पाकर शिलकने कहा— |
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अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ॥ १ ॥
‘इस लोककी क्या गति है ?’ इसपर प्रवाहणने कहा—आकाश, क्योंकि ये समस्त भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं, आकाशमें ही लयको प्राप्त होते हैं और आकाश ही इनसे बड़ा है; अतः आकाश ही इनका आश्रय है ॥ १ ॥
| अस्य लोकस्य का गतिरिति आकाश इति होवाच प्रवाहणः । आकाश इति च पर आत्मा “आकाशो वै नाम” ( छा० उ० ८।१४।१) इति श्रुतेः । तस्य हि कर्म सर्वभूतोत्पादकत्वम् । तस्मिन्नेव हि भूतप्रलयः । “तत्तेजोऽसृजत” (६।२।३), “तेजः परस्यां देवतायाम्” (६।८।६) इति हि वक्ष्यति । | ‘इस लोककी गति क्या है । इसपर प्रवाहणने कहा-‘आकाश’ । यहाँ ‘आकाश’ शब्दसे परमात्मा विवक्षित है । [ भूताकाश नहीं ] जैसा कि “आकाश ही नाम [ और रूपका निर्वाह करनेवाला है ]” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । सम्पूर्ण भूतोंको उत्पन्न करना यह उसीका कार्य है और उसीमें भूतोंका प्रलय होता है; जैसा कि श्रुति “उसने तेजको रचा” “तेज पर देवतामें लीन होता है” इत्यादि प्रकारसे आगे कहेगी । |