छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 151, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 151
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्याथ [ १४७
अनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः संचरो हुंकारः ॥३॥
जिसका [ विशेषरूपसे ] निरूपण नहीं किया जाता और जो [ कार्यरूपसे ] संचार करनेवाला है वह तेरहवाँ स्तोभ हुंकार है ॥ ३ ॥
| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी (अनुवाद) |
|---|---|
| अनिरुक्तोऽव्यक्तत्वादिदं चेदं चेति निर्वक्तुं न शक्यत इत्यतः संचरो विकल्प्यमानस्वरूप इत्यर्थः। कोऽसौ ? इत्याह- त्रयोदशः स्तोभो हुंकारः। अव्यक्तो ह्ययमतोग्निरुक्तविशेष एवोपास्य इत्यभिप्रायः ॥ ३ ॥ | जो अव्यक्त होनेके कारण 'यह और यह' इस रूपसे निरूपित नहीं किया जा सकता, इसलिये अनिरुक्त है और संचर अर्थात् विकल्प्यमानस्वरूप है, वह क्या है ? सो बतलाते हैं—वह तेरहवाँ स्तोभ हुंकार है। वह अव्यक्त ही है, अतः अनिरुक्तविशेषरूपसे ही उपासनीय है—यह इसका अभिप्राय है ॥ ३ ॥ |
—: ० :—
स्तोभाक्षरसम्बन्धिनी उपासनाओंका फल
| स्तोभाक्षरोपासनाफलमाह— | अब स्तोभाक्षरोंकी उपासनाका फल बतलाते हैं— |
दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवꣳसाम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद ॥४॥
जो इस प्रकार इस सामसम्बन्धिनी उपनिषद्को जानता है उसे वाणी, जो वाणीका फल है उस फलको देती है तथा वह अन्नवान् और अन्न भक्षण करनेवाला होता है ॥ ४ ॥
| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी (अनुवाद) |
|---|---|
| दुग्धेऽस्मै वाग्दोहमित्याद्युक्तार्थम् । य एतामेवं यथोक्त- | 'दुग्धेऽस्मै वाग्दोहम्' इत्यादि-वाक्यका अर्थ पहले (छा० १।३।७ में) कहा जा चुका है। जो |