छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| १५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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ॐ समस्त सामकी उपासना साधु है। जो साधु होता है उसको साम कहते हैं और जो असाधु होता है वह असाम कहलाता है ॥१॥
| समस्तस्य सर्वावयवविशिष्टस्य पाञ्चभक्तिकस्य सप्तभक्तिकस्य चेत्यर्थः। खल्विति वाक्यालंकारार्थः साम्न उपासनं साधु। समस्ते साम्नि साधुदृष्टिविधिपरत्वान्न पूर्वोपासननिन्दार्थत्वं साधुशब्दस्य। <br><br> ननु पूर्वत्राविद्यमानं साधुत्वं समस्ते साम्न्यभिधीयते, न; साधु सामेत्युपास्त इत्युपसंहारात्। साधुशब्दः शोभनवाची कथमवगम्यते ? इत्याह-यत्खलु लोके साधु शोभनमनवद्यं प्रसिद्धं तत्सामेत्याचक्षते कुशलाः। यदसाधु विपरीतं तदसामेति ॥ १ ॥ | समस्त अर्थात् सम्पूर्ण अवयवोंसे युक्त यानी पाञ्चभक्तिक और साप्तभक्तिक सामकी उपासना साधु है। 'खलु' यह निपात वाक्यकी शोभा बढ़ानेके लिये है। समस्त साममें साधुदृष्टिका विधान करनेमें प्रवृत्त होनेके कारण साधु शब्द पूर्व उपासनाकी निन्दाके लिये नहीं है। <br><br> यदि कहो कि पूर्व उपासनामें न रहनेवाली ही साधुता समस्त साममें बतलायी जाती है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि [पूर्वोक्त उपासनाका] 'साम साधु है इस प्रकार उपासना करे' ऐसा कहकर उपसंहार किया है। 'साधु' शब्द शोभन अर्थका बोधक है—यह कैसे जाना जाता है ? इसपर कहते हैं—लोकमें जो वस्तु साधु—शोभन अर्थात् निर्दोष-रूपसे प्रसिद्ध है उसको निपुणजन 'साम' ऐसा कहकर पुकारते हैं। तथा जो असाधु यानी विपरीत होती है, उसको असाम कहते हैं ॥१॥ |