छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 173, कुल 978 में से
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खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६९
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| एतद्दृष्ट्या विशिष्टं यः परोवरीयः सामोपास्ते परोवरीयो हास्य जीवनं भवतीत्युक्तार्थम् । इति तु पञ्चविधस्य साम्न उपासनमुक्तमिति सप्तविधे वक्ष्यमाणविषये बुद्धिसमाधानार्थम् । निरपेक्षो हि पञ्चविधे वक्ष्यमाणे बुद्धिं समाधित्सति ॥ २ ॥ | जो पुरुष इस प्राणदृष्टिसे युक्त उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर सामकी उपासना करता है उसका जीवन निश्चय ही उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जाता है—यह अर्थ पहले (१ । ९ । २ में) कहा जा चुका है । इस प्रकार यह पाँच प्रकारके सामकी उपासना तो कह दी गयी; यह बात श्रुतिने आगे कही जानेवाली सप्तविध सामोपासनामें बुद्धिको समाहित करनेके लिये कही है, क्योंकि पञ्चविध सामोपासनामें निरपेक्ष हुआ पुरुष ही आगे कही जानेवाली उपासनामें बुद्धिको समाहित करना चाहेगा ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥