छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 174, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम खण्ड
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वाणीविषयक सप्तविध सामोपासना
अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधँ सामोपासीत यत्किं च वाचो हुमिति स हिंकारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिः ॥ १ ॥
अब सप्तविध सामकी उपासनाका प्रकरण [ आरम्भ किया जाता ] है—वाणीमें सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये । वाणीमें जो कुछ 'हुँ' ऐसा स्वरूप है वह हिंकार है, जो कुछ 'प्र' ऐसा स्वरूप है वह प्रस्ताव है और जो कुछ 'आ' ऐसा स्वरूप है वह आदि है ॥ १ ॥
| अथानन्तरं सप्तविधस्य समस्तस्य साम्न उपासनं साध्विद्मारभ्यते । वाचीति सप्तमी पूर्ववत् । वाग्दृष्टिविशिष्टं सप्तविधं सामोपासीतेत्यर्थः । यत्किञ्च वाचः शब्दस्य हुमिति यो विशेषः स हिंकारो हकारसामान्यात् । यत्प्रेति शब्दरूपं स प्रस्तावः प्रसामान्यात् । यत् आ | अब इसके पश्चात्—यह सप्तविध समस्त सामकी साधु उपासना आरम्भ की जाती है। श्रुतिमें 'वाचि' इस पदकी सप्तमी विभक्ति पूर्ववत् ('लोकेषु' आदि पदोंकी सप्तमीके समान ) समझनी चाहिये। इसका तात्पर्य यह है कि वाग्दृष्टिविशिष्ट सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये। जो कुछ वाणी अर्थात् शब्दका 'हूँ' ऐसा विशेषरूप है वह हिंकार है, क्योंकि 'हूँ' और हिंकारमें हकारकी समानता है जो कुछ 'प्र' ऐसा शब्दरूप है वह प्रस्ताव है, क्योंकि उन दोनोंमें 'प्र' शब्दका सादृश्य है । तथा जो कुछ |