भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 978 में से

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पृष्ठ 175

खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थं १७१


| इति स आदिः, आकारसामान्यात् आदिरित्योङ्कारः, सर्वादित्वात् ॥ १ ॥ | 'आ' ऐसा शब्दरूप है वह आकारमें समता होनेके कारण आदि है । 'आदि' यह ओङ्कारका वाचक है, क्योंकि वही सबका आदि है ॥१॥ |


यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनम् ॥ २ ॥

जो कुछ 'उत्' ऐसा शब्दरूप है वह उद्गीथ है, जो कुछ 'प्रति' ऐसा शब्द है वह प्रतिहार है, जो कुछ 'उप' ऐसा शब्द है वह उपद्रव है और जो कुछ 'नि' ऐसा शब्दरूप है वह निधन है ॥ २ ॥


| यदुदिति स उद्गीथः, उत्पूर्वत्वादुद्गीथस्य । यत्प्रतीति स प्रतिहारः, प्रतिसामान्यात् । यदुपेति स उपद्रव उपोपक्रमत्वादुपद्रवस्य । यन्नीति तन्निधनम्, निशब्दसामान्यात् ॥२॥ | जो कुछ 'उत्' ऐसा शब्दरूप है वह उद्गीथ है, क्योंकि 'उद्गीथ' शब्दके आरम्भमें 'उत्' है; जो कुछ 'प्रति' ऐसा शब्दस्वरूप है वह प्रतिहार है, क्योंकि उनमें 'प्रति' शब्दका सादृश्य है; जो कुछ 'उप' ऐसा शब्दरूप है वह उपद्रव है, क्योंकि उपद्रव शब्दके आरम्भमें 'उप' शब्द है तथा जो कुछ 'नि' ऐसा शब्दरूप है वह निधन है, क्योंकि 'नि' और 'निधन' में 'नि' शब्दकी समानता है ॥ २ ॥ |


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