भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 978 में से

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पृष्ठ 185

दशम खण्ड

मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना

| मृत्युरादित्यः अहोरात्रादि-कालेन जगतः प्रमापयितृत्वा-त्तस्यातितरणायेदं सामोपासन-मुपदिश्यते— | दिवस और रात्रि आदि कालके द्वारा जगत्का प्रमापयिता [ अर्थात् वधकर्ता ] होनेके कारण आदित्य मृत्यु है, उसे पार करनेके लिये इस सामोपासनाका उपदेश किया जाता है— |

अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधꣳसामो-
पासीत हिङ्कार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं
तत्समम् ॥ १ ॥

अब [ यह बतलाया जाता है कि ] समान अक्षरोंवाले मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना करे। 'हिंकार' यह तीन अक्षरोंवाला है तथा 'प्रस्ताव' यह भी तीन अक्षरोंवाला है, अतः उसके समान है ॥ १ ॥

| अथ खल्वनन्तरमादित्य-मृत्युविषयसामोपासनस्यात्मसं-मितं स्वावयवतुल्यतया मितं परमात्मतुल्यतया वा संमित-मतिमृत्यु मृत्युजयहेतुत्वात् । | अब निश्चय ही आदित्यरूप मृत्यु-के विषयभूत सामकी उपासनाके पश्चात् आत्मसंमित—अपने अवयवों ( सामावयवों ) की तुल्यताद्वारा परिमिति अथवा परमात्मसदृशताके कारण ज्ञात, जो मृत्युको जीतनेका हेतु होनेके कारण अतिमृत्यु है, [ उस सप्तविध सामकी उपासना |

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