छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 213, कुल 978 में से
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खण्ड २२ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९
| शाङ्करभाष्य | शाङ्करभाष्यार्थ |
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| शेषः। तच्च साम्नः संबन्धि पशुभ्यो हितं पशव्यमग्नेरग्निदैवत्यं चोद्गीथ उद्गानम्। तदहमेवं विशिष्टं वृणे प्रार्थय इति कश्चिद्यजमान उद्गाता वा मन्यते। | लिये हितकर और अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ—उद्गान है। इस प्रकारके उस विशिष्ट सामका मैं वरण करता हूँ अर्थात् उसके लिये प्रार्थना करता हूँ—इस प्रकार कोई यजमान अथवा उद्गाता मानता है। |
| अनिरुक्तोऽमुकसम इत्यविशेषितः प्रजापतेः प्रजापतिदैवत्यः स गानविशेषः, आनिरुक्त्यात्प्रजापतेः। निरुक्तः स्पष्टः सोमस्य सोमदैवत्यः स उद्गीथ इत्यर्थः। मृदु श्लक्ष्णं च गानं वायोर्वायुदैवत्यं तत्। श्लक्ष्णं बलवच्च प्रयत्नाधिक्योपेतं चेन्द्रस्यैन्द्रं तद्गानम्। क्रौञ्चं क्रौञ्चपक्षिनिनादसमं बृहस्पतेर्बार्हस्पत्यं तत्। अपध्वान्तं भिन्नकांस्यस्वरसमं वरुणस्यैतद्गानम्। तान् सर्वानिवोपसेवेत प्रयुञ्जीत वारुणं त्वेवैकं वर्जयेत् ॥ १ ॥ | प्रजापतिका जो गानविशेष है, वह अनिरुक्त है अर्थात् अमुकके तुल्य है—इस प्रकार विशेषरूपसे निरूपित नहीं किया जा सकता; क्योंकि प्रजापति भी विशेषरूपसे निरूपित नहीं किया जाता। सोमका अर्थात् सोमदेवतासम्बन्धी जो उद्गीथ है, वह निरुक्त यानी स्पष्ट है। जो गान मृदु और श्लक्ष्ण है, वह वायुका यानी वायुदेवतासम्बन्धी है। जो श्लक्ष्ण और बलवान् यानी अधिक प्रयत्नकी अपेक्षावाला है, वह इन्द्रका यानी इन्द्रसम्बन्धी गान है। जो क्रौञ्च यानी क्रौञ्चपक्षीके शब्दके समान है, वह बृहस्पतिका यानी बृहस्पतिदेवतासम्बन्धी गान है। अपध्वान्त अर्थात् फूटे हुए काँसेके स्वरके समान जो है, वह वरुणदेवतासम्बन्धी गान है। उन सभीका सेवन अर्थात् प्रयोग करे, एकमात्र वरुणसम्बन्धी गानका ही त्याग करे ॥ १ ॥ |