छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 228, कुल 978 में से
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२१४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| नाभिचरेदिति प्रतिषिद्धमप्यभिचरणं कश्चित्कुर्वन्दृष्ट इति शत्रौ द्वेषरहितेनापि विवेकिनाभिचरणं क्रियते। न च कर्मविधिप्रवृत्तिनिमित्ते भेदप्रत्यये बाधितेऽग्निहोत्रादौ प्रवर्तकं निमित्तमस्ति। परिव्राजकस्येव भिक्षाचरणादौ बुभुक्षादि प्रवर्तकम्। | 'अभिचार न करे' इस प्रकार प्रतिषिद्ध होनेपर भी किसीको अभिचार करते देखा है--इतनेहीसे जिसका शत्रुके प्रति द्वेषभाव भी नहीं है वह विवेकी पुरुष—भी अभिचार करने लगे—यह सम्भव नहीं है। इसी प्रकार कर्मविधिकी प्रवृत्तिके निमित्तभूत भेदप्रत्ययका बोध हो जानेपर बोधवान् पुरुषको अग्निहोत्रादि कर्ममें प्रवृत्त करनेवाला कोई निमित्त नहीं है, जिस प्रकार कि संन्यासीको भिक्षाटनादिमें प्रवृत्त करनेवाला क्षुधादिरूप निमित्त है। |
| इहाप्यकरणे प्रत्यवायभयं प्रवर्तकमिति चेत् ? | पूर्व०--यहाँ भी नित्यकर्म न करनेपर प्रत्यवाय होनेका भय ही प्रवृत्त करनेवाला है-यदि ऐसा मानें तो? |
| न, भेदप्रत्ययवतोऽधिकृतत्वात्। भेदप्रत्ययवानुपमर्दितभेदबुद्धिर्विद्यया यः स कर्मण्यधिकृत इत्यवोचाम। यो ह्यधिकृतः कर्मणि तस्य तदकरणे प्रत्यवायो न निवृत्ताधिकारस्य; | सिद्धान्ती--नहीं, क्योंकि कर्मानुष्ठानका अधिकारी भेदज्ञानी ही है। जिसकी भेदबुद्धि ज्ञानसे नष्ट नहीं हुई है वह भेदज्ञानी ही कर्मका अधिकारी है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं। इस प्रकार जो कर्मका अधिकारी है उसे ही उसके न करनेपर प्रत्यवाय हो सकता है। जो उसके अधिकारसे बाहर है उसे प्रत्यवाय नहीं हो सकता, जिस |