भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 284

२८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३


| मात्रायाःसर्वभूतत्वमनुपपन्नमिति गायत्रीकारणं वाचं शब्दरूपामापादयति गायत्रीम्, वाग्वै गायत्रीति ।<br><br>वाग्वा इदं सर्वं भूतम् ।<br><br>यस्माद्वाक्शब्दरूपा सती सर्वं भूतं गायति शब्दयत्यसौ गौरसावश्व इति च, त्रायते च रक्षत्यमुष्मान्मा भैषीः, किं ते भयमुत्थितम्, इत्यादिना सर्वतो भयान्निवर्त्यमानो वाचा त्रातःस्यात् । यद्वाग्भूतं गायति च त्रायते च गायत्र्येव तद्गायति च त्रायते च वाचोऽनन्यत्वाद्गायत्र्याः । गानात्त्राणाच्च गायत्र्या गायत्रीत्वम् ॥ १ ॥ | है, उसका सर्वभूतरूप होना तो सम्भव नहीं है; अतः 'वाग्वै गायत्री' ऐसा कहकर श्रुति गायत्रीकी कारणभूत शब्दरूप वाक्को ही गायत्री कहती है ।<br><br>वाक् ही यह सब भूतसमुदाय है; क्योंकि शब्दरूप हुई वाक् ही समस्त भूतोंका गान—शब्द यानी नामोल्लेख करती है; जैसे 'यह गौ है' 'यह अश्व है' इत्यादि; तथा यही त्राण—रक्षा करती है; जैसे 'इससे मत डर' 'तुझे क्या भय उत्पन्न हुआ है ?' इत्यादि वाक्योंसे सब ओरसे भयसे निवृत्त किये जानेपर वाणीके ही द्वारा मनुष्यकी रक्षा की जाती है । इस प्रकार वाणी जो प्राणियोंका गान और त्राण करती है वह गान और त्राण गायत्रीके द्वारा ही किया जाता है, क्योंकि गायत्री वाणीसे भिन्न नहीं है । गान और त्राण करनेके कारण ही गायत्रीका गायत्रीत्व है ॥ १ ॥ |


या वै सा गायत्र्ययं वाव सा येयं पृथिव्यस्याँ हीदँ सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयते ॥ २ ॥