छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 285, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ २८१
जो वह गायत्री है वह यही है, जो कि यह पृथिवी है; क्योंकि इसीमें ये सब भूत स्थित हैं और इसीका वे कभी अतिक्रमण नहीं करते ॥ २ ॥
| या वै सैवंलक्षणा सर्वभूतरूपा गायत्री; इयं वाव सा येयं पृथिवी। कथं पुनरियं पृथिवी गायत्रीति? उच्यते—सर्वभूतसंबन्धात्। कथं सर्वभूतसंबन्धः? अस्यां पृथिव्यां हि यस्मात्सर्वं स्थावरं जङ्गमं च भूतं प्रतिष्ठितम्, एतामेव पृथिवीं नातिशीयते नातिवर्तत इत्येतत्।<br><br>यथा गानत्राणाभ्यां भूतसंबन्धो गायत्र्याः, एवं भूतप्रतिष्ठानाद्भूतसंबद्धा पृथिवी; अतो गायत्री पृथिवी ॥ २ ॥ | जो वह ऐसे लक्षणोंवाली सर्वभूतरूप गायत्री है वह यही है, जो कि यह पृथिवी है। किंतु यह पृथिवी गायत्री किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है—सम्पूर्ण प्राणियोंसे इसका सम्बन्ध होनेके कारण यह गायत्री है। इसका समस्त प्राणियोंसे किस प्रकार सम्बन्ध है? क्योंकि इस पृथिवीमें ही समस्त स्थावर तथा जङ्गम प्राणी स्थित हैं और वे इस पृथिवीका ही अतिक्रमण अर्थात् अतिवर्तन कभी नहीं करते।<br><br>जिस प्रकार गान और त्राणके कारण गायत्रीका प्राणियोंसे सम्बन्ध है उसी प्रकार भूतोंकी प्रतिष्ठा होनेके कारण पृथिवी भूतोंसे सम्बद्ध है अतः पृथिवी गायत्री है ॥ २ ॥ |
या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन्पुरुषे शरीरमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥ ३ ॥
जो भी यह पृथिवी है वह यही है जो कि इस पुरुषमें शरीर है; क्योंकि इसीमें ये प्राण स्थित हैं और इसीको वे कभी नहीं छोड़ते ॥ ३ ॥