भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 287

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २८३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
प्राणाः प्रतिष्ठिताः; अतः शरीरवद्गायत्री हृदयम् । एतदेव च नातिशीयन्ते प्राणाः । "प्राणो ह पिता प्राणो माता ।" ( छा० उ० ७ । १५ । १ ) "अहिंसन्सर्वभूतानि" ( छा० उ० ८ । १५ । १ ) इति च श्रुतेः, भूतशब्दवाच्याः प्राणाः ॥ ४ ॥क्योंकि इसीमें ये प्राण प्रतिष्ठित हैं । अतः शरीरके समान हृदय गायत्री है, क्योंकि प्राण इसका भी अतिक्रमण नहीं करते । "प्राण पिता है, प्राण माता है" "सम्पूर्ण प्राणियोंकी हिंसा न करते हुए" इत्यादि श्रुतियाँ होनेके कारण प्राण 'भूत' शब्दवाच्य हैं ॥ ४ ॥
<div align="center">—: ❀ :—</div>

सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदृचाभ्यनूक्तम् ॥ ५ ॥

वह यह गायत्री चार चरणोंवाली और छः प्रकारकी है । वह यह [ गायत्र्याख्य ब्रह्म ] मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित किया गया है ॥ ५ ॥

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
सैषा चतुष्पदा षडक्षरपदा छन्दोरूपा सती भवति गायत्री षड्विधा वाग्भूतपृथिवीशरीरहृदयप्राणरूपा सती षड्विधा भवति । वाक्प्राणयोरन्यार्थनिर्दिष्टयोरपि गायत्रीप्रकारत्वम्; अन्यथा षड्विधसंख्यापूरणानुपपत्तेः । तदेतस्मिन्नर्थ एतद्गायत्र्याख्यं ब्रह्म गायत्र्यनुगतं गायत्रीमुखेनोक्त-वह यह चार पदोंवाली और छः-छः अक्षरोंके पदोंवाली है तथा वाक्, भूत, पृथिवी, शरीर, हृदय और प्राणरूपा होनेसे वह षड्विधा—छः प्रकारकी है । वाक् और प्राणका यद्यपि अन्य अर्थमें निर्देश किया गया है, तो भी वे गायत्रीके प्रकाररूपसे स्वीकृत किये जाते हैं; अन्यथा गायत्रीके छः प्रकारोंकी संख्या पूर्ण नहीं हो सकती । इसी अर्थमें यह गायत्रीसंज्ञक ब्रह्म, जो गायत्रीका