छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 308, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| कथं सर्वस्य ब्रह्मत्वम् ? इत्यत आह—तज्जलानिति; तस्माद्ब्रह्मणो जातं तेजोऽबन्नादिक्रमेण सर्वम्, अतस्तज्जम्; तथा तेनैव जननक्रमेण प्रतिलोमतया तस्मिन्नेव ब्रह्मणि लीयते तदात्मतया श्लिष्यत इति तल्लम्, तथा तस्मिन्नेव स्थितिकालेऽनिति प्राणिति चेष्टत इति । एवं ब्रह्मात्मतया त्रिषु कालेष्वविशिष्टं तद्व्यतिरेकेणाग्रहणात् । अतस्तदेवेदं जगत् । यथा चेदं तदेवैकमद्वितीयं तथा षष्ठे विस्तरेण वक्ष्यामः ।<br><br>यस्माच्च सर्वमिदं ब्रह्म, अतः शान्तो रागद्वेषादिदोषरहितः संयतः सन्यत्तत्सर्वं ब्रह्म तद्वक्ष्यमाणैर्गुणैरुपासीत ।<br><br>कथमुपासीत ? क्रतुं कुर्वीत ऋतुर्निश्चयोऽध्यवसाय एवमेव | यह सब ब्रह्मरूप किस प्रकार है ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—'तज्जलानिति'। तेज, अप् और अन्नादि क्रमसे सारा जगत् उस ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ है, इसलिये यह 'तज्ज' है तथा उसी जननक्रमके विपरीत क्रमसे उस ब्रह्ममें ही लीन होता है अर्थात् तादात्म्यरूपसे उसमें मिल जाता है, इसलिये 'तल्ल' है और अपनी स्थितिके समय उसीमें अनन-प्राणन यानी चेष्टा करता है, इसलिये 'तदन' है। इस प्रकार ब्रह्मात्मरूपसे वह तीनों कालोंमें समान रहता है, क्योंकि उसका उस (ब्रह्म) के बिना ग्रहण नहीं किया जाता; अतः वह (ब्रह्म) ही यह सारा जगत् है। जिस प्रकार यह जगत् 'वह एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म ही है' उसका हम छठे अध्यायमें विस्तारपूर्वक निरूपण करेंगे।<br><br>क्योंकि यह सब ब्रह्म है, अतः शान्त यानी राग-द्वेषसे रहित—संयतेन्द्रिय होकर वह जो सब ब्रह्म है उसकी आगे कहे जानेवाले गुणोंद्वारा उपासना करे।<br><br>उसकी किस प्रकार उपासना करे ? [सो बतलाते हैं—] क्रतु करे—'क्रतु' निश्चय यानी अध्यवसाय- |