भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 347

खण्ड १८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४३


| तथा प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स वायुना गन्धाय भाति च तपति च । तथा चक्षुरादित्येन रूपग्रहणाय श्रोत्रं दिग्भिः शब्दग्रहणाय । विद्याफलं समानम् । सर्वत्र ब्रह्मसंपत्तिरदृष्टं फलं य एवं वेद । द्विरुक्तिर्दर्शनसमाप्त्यर्था॥४-६॥ | इसी प्रकार प्राण ही ब्रह्मका चौथा पाद है । वह वायुद्वारा गन्धग्रहणके लिये प्रकाशित होता और तपता है [ अर्थात् उत्साहित होता है ] । इसी तरह चक्षु रूपग्रहणके लिये आदित्यद्वारा और श्रोत्र शब्दग्रहणके लिये दिशाओंके द्वारा उत्साहित होता है । इस प्रकारकी उपासनाका फल सर्वत्र समान है । जो ऐसा जानता है उसे सर्वत्र ब्रह्मप्राप्तिरूप 'अदृष्ट फल मिलता है । 'य एवं वेद, य एवं वेद' यह द्विरुक्ति विद्याकी समाप्तिके लिये है ॥ ४–६ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये अष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १८ ॥