भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 978 में से

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पृष्ठ 348

एकोनविंश खण्ड

आदित्य और अण्डदृष्टिसे अध्यात्म एवं आधिदैविक उपासना

आदित्यो ब्रह्मणः पाद उक्त इति तस्मिन्सकलब्रह्मदृष्ट्यर्थमिदमारभ्यते—आदित्यको ब्रह्मका पाद बतलाया गया है; अतः उसमें समस्त ब्रह्मकी दृष्टि करनेके लिये इस खण्डका आरम्भ किया जाता है—

आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत्। तत्सदासीत्तत्समभवत्तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम् ॥ १ ॥

आदित्य ब्रह्म है—ऐसा उपदेश है; उसीकी व्याख्या की जाती है। पहले यह असत् ही था। वह सत् (कार्याभिमुख) हुआ। वह अङ्कुरित हुआ। वह एक अण्डेमें परिणत हो गया। वह एक वर्षपर्यन्त उसी प्रकार पड़ा रहा। फिर वह फूटा; वे दोनों अण्डेके खण्ड रजत और सुवर्णरूप हो गये ॥ १ ॥


(पार्श्व-टिप्पणी: असत्कार्यवाद-समीक्षा)

आदित्यो ब्रह्मेत्यादेश उपदेशस्तस्योपन्याख्यानं क्रियते स्तुत्यर्थम्। असद्व्याकृतनामरूपमिदं जगदशेषमग्रे प्रागवस्थाया-'आदित्य ब्रह्म है' यह आदेश-उपदेश है। उस आदित्यका स्तुतिके लिये उपाख्यान किया जाता है। पहले अर्थात् अपनी उत्पत्तिसे पूर्वकी अवस्थामें यह सम्पूर्ण जगत् असत्—जिसके नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति नहीं हुई है ऐसा था; सर्वथा असत [शून्य]