छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 349, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 349
खण्ड १९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४५
| संस्कृत भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| म्युत्पत्तेरासीन्न त्वसदेव; 'कथमसतः सज्जायेत' इत्यसत्कार्यत्वस्य प्रतिषेधात् । | ही नहीं था; क्योंकि 'असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो सकती है' इस प्रकार [ आगे छठे अध्यायमें ] श्रुतिने असत्कार्यत्वका प्रतिषेध किया है । |
| नन्विहासदेवेति विधानाद्विकल्पः स्यात् । | पूर्व०—किंतु यहाँ 'असदेव आसीत्' ऐसा विधान होनेके कारण विकल्प* हो सकता है । |
| न; क्रियास्वेव वस्तुनि विकल्पानुपपत्तेः । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि क्रियाओंके समान वस्तुमें विकल्प होना सम्भव नहीं है । |
| कथं तर्हीदमसदेवेति ? | पूर्व०—तो फिर 'इदम् असत् एव' यह वाक्य क्यों कहा गया है ? |
| नन्ववोचामाव्याकृतनामरूपत्वादसदिवासदिति । | सिद्धान्ती—हम कह चुके हैं न, कि नाम-रूपकी अभिव्यक्तिसे रहित होनेके कारण मानो असत्की तरह 'असत्' था । |
| नन्वेवशब्दोऽवधारणार्थः । | पूर्व०—किंतु 'एव' शब्द तो निश्चयार्थक है ! |
| सत्यमेवम् , न तु सत्त्वाभावमवधारयति । | सिद्धान्ती—यह तो ठीक है, किंतु यह सत्ताके अभावका निश्चय नहीं करता । |
| किं तर्हि ? | पूर्व०—तो फिर क्या करता है ? |
| व्याकृतनामरूपाभावमवधारयति; नामरूपव्याकृतविषये सच्छब्दप्रयोगो दृष्टः । तच्च नामरूपव्याकरणमादित्यायत्तं प्रायशो | सिद्धान्ती—व्यक्त नाम-रूपके अभावका निश्चय करता है । 'सत्' शब्दका प्रयोग, जिनके नाम-रूप व्यक्त हो गये हैं उन पदार्थोंके विषयमें देखा गया है; और जगत्के नाम-रूपकी अभिव्यक्ति प्रायः आदित्यके अधीन |
* अर्थात् सृष्टिके पूर्व यह सब कुछ 'असत्' अथवा सत्' था, इस प्रकार विकल्प हो सकता है ।