भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 978 में से

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पृष्ठ 350

३४६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३


| जगतः । तदभावे ह्यन्धं तम इदं न प्रज्ञायेत किञ्चन, इत्यतस्तत्स्तुतिपरे वाक्ये सदपीदं प्रागुत्पत्तेर्जगदसदेवेत्यादित्यं स्तौति ब्रह्मदृष्ट्यर्हत्वाय । <br><br> आदित्यनिमित्तो हि लोके सदिति व्यवहारः; यथासदेवेदं राज्ञः कुलं सर्वगुणसंपन्ने पूर्णवर्मणि राजन्यसतीति तद्वत् । न च सत्त्वमसत्त्वं वेह जगतः प्रतिपिपादयिषितम्, आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशपरत्वात् । उपसंहरिष्यत्यन्ते 'आदित्यं ब्रह्मेत्युपास्ते' इति । <br><br> तत्सदासीत्, तदसच्छब्दवाच्यं प्रागुत्पत्तेः स्तिमितमनिस्पन्दमसदिव सत्कार्याभिमुखमीषदुप- | है, क्योंकि उसके अभावमें घोर अन्धकाररूप हुआ यह जगत् कुछ भी नहीं जाना जाता। इसलिये आदित्यके स्तवनपरक वाक्यमें, सत् होनेपर भी उत्पत्तिसे पूर्व यह जगत् 'असत ही था' ऐसा कहकर श्रुति, यह सूचित करनेके लिये कि आदित्य ब्रह्मदृष्टिके योग्य है, उसकी स्तुति करती है। <br><br> लोकमें आदित्यके कारण ही 'सत' ऐसा व्यवहार होता है, जिस प्रकार 'सर्वगुणसम्पन्न राजा पूर्णवर्माके न रहनेसे यह राजवंश नहीं-सा रह गया है' ऐसा कहा जाता है, उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये। इसके सिवा यहाँ इस वाक्यसे जगत्की सत्ता अथवा असत्ताका प्रतिपादन करना अभीष्ट भी नहीं है, क्योंकि यह 'मन्त्र आदित्य ब्रह्म है' ऐसा आदेश करनेके लिये ही है; तथा अन्तमें भी 'आदित्य ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है—ऐसा कहकर श्रुति इसका उपसंहार करेगी। <br><br> 'तत्सदासीत्'—वह, 'असत्' शब्दसे कहा जानेवाला तत्त्व, जो उत्पत्तिसे पूर्व स्तब्ध, स्पन्दनरहित और असत्के समान था, सत् यानी कार्याभिमुख होकर कुछ प्रवृत्ति |

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