भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 351, कुल 978 में से

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पृष्ठ 351
खण्ड १९ ]शाङ्करभाष्यार्थं३४७

| जातप्रवृत्ति सदासीत् ततो लब्धपरिस्यन्दं तत्समभवदल्पतरनामरूपव्याकरणेनाङ्कुरीभूतमिव बीजम् । ततोऽपि क्रमेण स्थूलीभवत्तदद्भ्य आण्डं समवर्तत संवृत्तम् । आण्डमिति दैर्घ्यं छान्दसम् ।<br><br>तदण्डं संवत्सरस्य कालस्य प्रसिद्धस्य मात्रां परिमाणमभिन्नस्वरूपमेवाशयत् स्थितं बभूव । तत्ततः संवत्सरपरिमाणात्कालादूर्ध्वं निरभिद्यत निर्भिन्नं वयसामिवाण्डम् । तस्य निर्भिन्नस्याण्डस्य कपाले द्वे रजतं च सुवर्णं चाभवतां संवृत्ते ॥ १ ॥ | पैदा होनेसे 'सत्' हो गया । फिर उससे भी कुछ स्पन्दन प्राप्त कर वह थोड़ेसे नाम-रूपकी अभिव्यक्तिके कारण अङ्कुरित हुए बीजके समान हो गया । उस अवस्थासे भी वह क्रमशः कुछ और स्थूल होता हुआ जलसे अण्डेके रूपमें परिणत हो गया । 'आण्डम्' यह दीर्घ प्रयोग वैदिक है ।<br><br>वह अण्डा संवत्सर नामसे प्रसिद्ध कालकी मात्रा यानी परिमाणतक [अर्थात् पूरे एक वर्ष] उसी प्रकार एकरूपसे पड़ा रहा । तत्पश्चात् एक वर्षपरिमाणकालके अनन्तर वह पक्षियोंके अण्डेके समान फूट गया । उस फूटे हुए अण्डेके जो दो खण्ड थे वे रजत और सुवर्णरूप हो गये ॥ १ ॥ |


तद्यद्रजतꣳसेयं पृथिवी यत्सुवर्णꣳसा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बꣳसमेघो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकꣳ स समुद्रः ॥ २ ॥

उनमें जो खण्ड रजत हुआ वह यह पृथिवी है और जो सुवर्ण हुआ वह द्युलोक है। उस अण्डका जो जरायु (स्थूल गर्भवेष्टन) था [वही] वे पर्वत हैं, जो उल्ब (सूक्ष्म गर्भवेष्टन) था वह मेघोंके सहित कुहरा