भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 978 में से

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पृष्ठ 362
३५८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| मानः संयन्ति संगच्छन्तेऽन्त- | नीचेके पासे भी प्राप्त हो जाते हैं | | र्भवन्ति। चतुरङ्के कृताये त्रिव्ये- | अर्थात् उसके अधीन हो जाते हैं; | | काङ्कानां विद्यमानत्वात्तदन्तर्भ- | तात्पर्य यह है कि चार अङ्कसे युक्त | | वन्तीत्यर्थः। यथायं दृष्टान्तः, | कृतनामक पासेमें तीन, दो और | | एवमेनं रैक्वं कृतायस्थानीयं | एक अङ्कवाले पासे भी विद्यमान | | त्रेताद्ययस्थानीयं सर्वं तदभि- | रहनेके कारण वे भी उसके अन्तर्गत | | समेत्यन्तर्भवति रैक्वे। किं तत् ? | हो जाते हैं। जैसा यह दृष्टान्त है; | | यत्किञ्च लोके सर्वाः प्रजाः साधु | उसी प्रकार कृतस्थानीय इस रैक्व- | | शोभनं धर्मजातं कुर्वन्ति तत्सर्वं | को त्रेतादिस्थानीय वह सब प्राप्त हो | | रैक्वस्य धर्मेऽन्तर्भवति। तस्य | जाता है—सब उस रैक्वके अन्तर्गत | | च फले सर्वप्राणिधर्मफलमन्तर्भ- | हो जाता है। वह क्या है ? वह | | वतीत्यर्थः। | यह कि जो कुछ लोकमें प्रजा साधु | | तथान्योऽपि कश्चिद्यस्तद्वेद्यं | —शोभन यानी धर्मकार्य करती है | | वेद, किं तत् ? यद्वेद्यं स रैक्वो | सब-का-सब रैक्वके धर्ममें समा | | वेद तद्वेद्यमन्योऽपि यो वेद तमपि | जाता है। तात्पर्य यह है कि | | सर्वप्राणिधर्मजातं तत्फलं च | समस्त प्राणियोंके धर्मफल उसके | | रैक्वमिवाभिसमेतीत्यनुवर्तते। स | धर्मफलके अन्तर्गत हो जाते हैं। | | एवंभूतोऽरैक्वोऽपि मया विद्वानेत- | तथा दूसरा पुरुष भी, जो कोई | | | उस वेद्यको जानता है—वह वेद्य | | | क्या है ? जिसे कि वह रैक्व | | | जानता है उस वेद्यको दूसरा भी | | | जो कोई जानता है उसे भी रैक्वके | | | समान समस्त प्राणियोंका धर्मसमूह | | | और उसका फल प्राप्त हो जाता है | | | इस प्रकार यहाँ ‘सर्वं तदभिसमेति’ इस | | | पूर्ववाक्यका अनुवर्तन होता है। वह | | | इस प्रकारका रैक्वसे भिन्न विद्वान् | | | भी मैंने ऐसा कहकर बतला दिया। |