छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५९
| दुक्त एवमुक्तः, रैक्वत्स एव कृतायस्थानीयो भवतीत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥ | तात्पर्य यह है कि रैक्वके समान वही कृतनामक पासेके सदृश होता है ॥ ४ ॥ |
तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव । स ह संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्गारारे ह सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो कथँसयुग्वा रैक्व इति ॥ ५ ॥ यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनँसर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ६ ॥
इस बातको जानश्रुति पौत्रायणने सुन लिया। [ दूसरे दिन सबेरे ] उठते ही उसने सेवकसे कहा—'अरे भैया ! तू गाड़ीवाले रैक्वके समान मेरी स्तुति क्या करता है !' [ इसपर सेवकने पूछा— ] 'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' ॥ ५ ॥ [ राजाने कहा— ] 'जिस प्रकार कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवाले रुषके अधीन उससे निम्नवर्ती समस्त पासे हो जाते हैं उसी प्रकार उस रैक्वको जो कुछ प्रजा सत्कर्म करती है, वह सब प्राप्त हो जाता है तथा जो कुछ वह ( रैक्व ) जानता है उसे जो कोई जानता है उसके विषयमें भी इस कथनद्वारा मैंने बतला दिया' ॥ ६ ॥
| तदु ह तदेतदीदृशं हंसवाक्यमात्मनः कुत्सारूपमन्यस्य विदुषो रैक्वादेः प्रशंसारूपमुपशुश्राव श्रुतवान्हर्म्यतलस्थो राजा जानश्रुतिः पौत्रायणः । तच्च हंसवाक्यं | महलकी छतपर स्थित राजा जानश्रुति पौत्रायणने अपनी निन्दारूप और रैक्व आदि किसी अन्य विद्वान्की प्रशंसारूप यह इस प्रकारका हंसका वचन सुन लिया । तथा उस हंसके वचनको पुनः- |